आज फिर उसी
चक्रव्यूव में
फँसा हूँ मैं
अभिमन्यु सा
लड़ता हुआ
अष्ट कौरवों से
चक्रव्यूव में
फँसा हूँ मैं
अभिमन्यु सा
लड़ता हुआ
अष्ट कौरवों से
अपने सभी
अस्त्र शास्त्रों को आजमाते
अस्त्र शास्त्रों को आजमाते
टूटे रथ के पहिये को
लेकर लड़ रहा हूँ
लेकर लड़ रहा हूँ
पर ……….. पर मैं
अभिमन्यु की मौत
नहीं मरूँगा
अभिमन्यु की मौत
नहीं मरूँगा
कृष्ण और अर्जुन सदृश
मेरे तन और मन
मेरे साथ हैं
मेरे तन और मन
मेरे साथ हैं
और मैं अंततः हराऊँगा
सभी कौरवों को
सभी कौरवों को
जीतूँगा समर मैं अनेक
इतना तो दम
है ही मुझमें
इतना तो दम
है ही मुझमें
क्योकि शिव का धनुष
व् कृष्ण का चक्र भी
मेरे पास है
व् कृष्ण का चक्र भी
मेरे पास है
और है परशुराम का
फरसा भी
फरसा भी
मेरा अखंड साहस
मुझे बल देगा
मुझे बल देगा
लड़ने का जूझने का
शत्रु के संहार का
शत्रु के संहार का
क्योकि राम व् कृष्ण का
पुत्र मैं
शिव का
आशीर्वाद प्राप्त
भक्त मैं
पुत्र मैं
शिव का
आशीर्वाद प्राप्त
भक्त मैं
न डरूँगा
न अपना
शोषण करने दूँगा
न अपना
शोषण करने दूँगा
उसे हराऊँगा
अपने अदम्य साहस से
इच्छा शक्ति से
अपने अदम्य साहस से
इच्छा शक्ति से
वोह कायरों के समान
मुझ पर
हमला करने का
प्रयास करेगा
छुप छुप कर
डर डर कर
मुझ पर
हमला करने का
प्रयास करेगा
छुप छुप कर
डर डर कर
पर वोह
सफल नहीं होगा
सफल नहीं होगा
मेरा आत्मबल
विजयी होगा
वोह धराशायी होगा
मृत्यु को प्राप्त होगा
विजयी होगा
वोह धराशायी होगा
मृत्यु को प्राप्त होगा
इसमें मुझे है
न किंचित संदेह
न किंचित संदेह
न आप को
होना चाहिए
होना चाहिए
क्योकि देवता पुत्र मैं
जो चाहूँ वो कर सकता हूँ
जो चाहूँ वो कर सकता हूँ
जो चाहूँ वो कर सकता हूँ
(समाप्त)
No comments:
Post a Comment