बूँद ओस की
चमकती है घास पर
रोज सुबह सुबह
मोतियों की मानिंद
वो ही बूँद चमकती है
स्वेद जल की
तुम्हारे लोनेरे चेहरे पर
कुछ इस तरह
कि तुम लगती हो
परियों की राजकुमारी सी
कुछ इस तरह जैसे
कि वोह शर्मा के अपना चेहरा
झुका ले कुछ विशेष कोण में
पर सदा न रहेगी ये
ओस की चमक
विदा हो जाएगी
उड़ जाएगी जब
सूरज चमकेगा सिर पर
और घोषणा करेगा
अपने तेज का
रूपसी अब अपने
रूप पर मत इतना इतराओ
क्योकि वोह तो
फ़ना होने वाला है
चढ़ते सूरज
समय के साथ
किसी ओस की
बूँद की मानिंद
(समाप्त)
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