कविता :शरीर और आत्मा
शरीर की कैद में
आत्मा बहुत छटपटाती है
निकलने का प्रयास करती है
पर निकल नहीं पाती
शरीर की.……… माया की
पकड़ बहुत मजबूत
रिश्तों की पकड़
मोहब्बत की जकड़न
उसे जल्दी निकलने नहीं देती
शरीर की कैद में
आत्मा .. ..पर
रह रह कर अपनी
उपस्थिति महसूस कराती है
अच्छे बुरे की पहिचान
बुरे काम करने में झिझक
वो ही सिखाती है
अच्छे काम करने का
ज्ञान देती है
अपने कर्तव्य पूर्ण
करने की प्रेरणा देती है
जीवन में ओज व्
जोश देती है
ईश्वर के आस्तित्व का
एहसास कराती है
आत्मा बताती है कि वोह
यहाँ किस
प्रयोजन से आई है
शरीर की कैद में
आत्मा बेचैन होती है
निकलने छूटने को
बेताब रहती है
एक बार छूटने या
निकलने का मतलब हैमौत
मौत का मतलब है
निर्जीव शरीर आत्मा गायब
और शरीर क्या
बस मिटटी समझो
जिसे जलाया जाता है
गाड़ा जाता है
या पानी में बहाया जाता है
एक बेकार की चीज
आत्मा ही शरीर का
ईश्वर से सम्बन्ध है
आत्मा ही शरीर का
जीवन रस है
आत्मा ही अतः
साफ़ सुथरी रखनी होगी
उसे दाग धब्बों से
बचाना होगा
चादर तभी साफ़
सुथरी रह पायेगी
और आत्मा को अपने पीहर
परमात्मा के घर जाने में
तब शर्म नहीं आएगी
शरीर की कैद में आत्मा
एक कैदी की भाँति मजबूर है
पर इतनी भी नहीं कि
अतीतयी शरीर को
सजा न दे सके
उसे सजा जरूर मिलेगी
जरूर मिलेगी जरूर मिलेगी
शरीर का धर्म है कि
वोह अपनी आत्मा को
सम्भाल कर रखे
बुराइयों से दूर रखे
सजा कर रखे कि
शरीर बन जाये एक मंदिर
और आत्मा उसका भगवान
कोमल सुन्दर और महान
पूरा भगवान पूरा भगवान
(समाप्त)
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