Wednesday, 22 July 2015

कविता : क्योंकि मैंने सच बोला है ....

वे ….आते ही होंगे ……
निकल चुके हैं ……दलबल के साथ ….
जीपों ..और …मोटर साइकलों ..पर …
तलवारों …छुरों …बन्दूकों के ..साथ
मुझे मारने ..           .क्योकि मैंने ..
सच …  बोला …है …….


मुझ अकेले को …..मारने …….
वे           दल     बल से    आते हैं ….
क्योकि वे   कायर हैं …डरपोक …हैं ..
वे …सच से ………बहुत ….डरते हैं …
हालाँकि         मैं कोई ……………..
अभिताब बच्चन   या .धर्मेन्द्र …नहीं
जो अकेले ही उन्हें …मार भगा ऊँगा ….
या  मार मार  कर ……उन्हें गिरा कर
ज़मीन पर   बिछा   दूँगा …


मुझे पता है …………………कि ..
जब वे आयेंगे …मेरे आस पास वाले ..
जान पहिचानी ………….मिलनेवाले
कहीं छुप जायेंगें ..      .छुप छुप कर ….
तमाशा देखेंगे ……उनके ज़ुल्म   का ..
मेरे …पिटने का ……अकेले होकर भी
उन      कायरों की            भीड़   का ….
भरपूर …..             .मुकाबले   का …
दो …चार     उनमें  तो अवश्य गिरेंगें …
क्योंकि आत्मबल      मेरे   साथ   है …
सच   मेरे   साथ है …मैं भागूँगा नहीं …..
डटकर …          मुकाबला …करूँगा ….
बेदम होकर …..          .गिरने  तक ……..
वीरगति ….               .मिलने तक …


वे गोलियों से ….मुझे छलनी कर देंगे …
चिल्ला ..     …चिल्ला …कर   कहेंगें …
देखो मोहल्ले वालो ….(जो   छुपे होंगे )
सच           बोलने       का   नतीज़ा …
हमसे           भिड़ने का       नतीजा …..
कुत्ते         की मौत            ..मरा है ….
देखो सड़क पर लावारिस  मरा पड़ा है …
बड़ा …सच का          बंदा बनता था
उछला .     .उछला ..    ..फिरता था


वे    ख़ुशी मानते .    ..नारे   लगाते
जीपों    ..     मोटर साइकिलों …पर
चले जायेंगें .   बीच चौराहे पर ..पड़ी
मेरी    खून से         लथपथ लाश .
लोगों   की भारी     तमाशबीन भीड़ …
सब चर्चा करेंगे बेमौत  मरा ये .बुढ्ढा ..
बड़ा …सच ……     .सच करता था ………
अरे सच   से  इसे क्या मिला …..?
भाई जैसे ज़माना चले …वैसे …चलो …
क्यों          ऐसे लोगों से …………
पँगा लेना          जान से हाथ धोना


पुलिस       की गाड़ी आ गयी है …
उसे देख पब्लिक  छटने लगी है …
दरोगा मुझे देखकर पहिचानने की ..
कोशिश                 कर रहा है …
सिपाही         भीड़ को हटा कर ..
.आस ..पास  मार्किंग कर रहा है
इन्हें          किसने  मारा …?
दरोगा               पूँछ रहा है …..
सब चुप  इधर उधर देख रहे हैं ..
कोई बोलता नहीं ….डर ..छाया है …
दहशत का        ……..राज है ..
कौन लोग थे ..? कितनी संख्या में थे ..?
आप       लोगों ने ….क्या देखा …
कोई             कुछ नहीं बोलता
लोग चुपचाप …खिसक रहें हैं …


एक पगला भीड़ से बाहर आता है ..
दरोगा को  बताता है बुढ्ढा पागल था …
सच के लिये            भागता था ….
सच को                पूजता …था ….
झूठ को      बेनकाब   करता  था ..
भ्रष्टाचार का.अनाचार का विरोध करता था
इसे तो     मरना ही था       सो मर गया …
दरोगा जी               इसे उठाइये ….
रस्में   ..                  .निभाइये ..
पंचनामा                     बनाइये …
पोस्ट मार्टम              …कराइये ..
अन्तिम                  संस्कार ….
सरकारी खर्चे            पर कराइये
नहीं तो ..लाश नदी के पानी में डाल …
छुटकारा ,,                    ,पाइये …


इसका तो      यही अन्जाम होना था
इसका तो   यही अन्जाम होना था अरे ..
क्या .कोई  पत्थर से भी सिर फोड़ता है …?..
मैं            सोच रहा था …
मैंने सच ही तो बोला था ………




(समाप्त) 
 ये आज  के     समाज    की   सच्चाई    है    कि  लोग सामाजिक
सरोकारों    से   मतलब    नहीं    रखते      पर   व्यवस्था        को
पानी पी पी के गरियाते हैं  जो थोड़े  बहुत लोग बुराइयों का विरोध
करतें हैं उन पर अत्याचारों का    कहर टूट पड़ता है और आमतौर
पर लोग उनका साथ नहीं देते

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