वोह आँखें
वोह बिछुड़ना
आँखों से
ओझिल होती सूरत
शनै शनै
याद आती है
वोह बिछुड़ने की घड़ियाँ
तुम्हारी वो ही सूरत तो
बसी है मन प्रांगण में
तुम उधर हो मज़बूर
इधर मैं भी
पर भूला नहीं
छण भर भी तुम्हे
कर्तव्यों की
पुकार पर हमने
दी है कुर्बानी
तुम वहां खुश रहो
यह दुआ मैं करता हूँ
अपना फ़र्ज़ ठीक से
अंज़ाम करो
यह दुआ करता हूँ
मैं भी खुश रहूँ
यह दुआ तुम करो
अपने फ़र्ज़ को
अंजाम कर सकूँ
यह कामना करो
हम मिलेंगे
अपने अपने
अंजाम दिए
फ़र्ज़ों के साथ
दोनों नदियों की
धार का
पुनः संगम होगा
सुख भरी डुबकी होगी
और तुम्हारा साथ
वोह सुस्वादु भोजन
और आत्मतीयता
उसी की चाह में
इंतज़ार में
कटेंगे यह दिन भी
तुम परेशान मत होना
मेरी खातिर
मैं भी धीरज धरूँगा
तुम्हारी खातिर
आखिर इंतज़ार का भी
अपना मज़ा है
वोही मज़ा तो
मैं अब ले रहा हूँ
कटते जा रहे है
दिन पर दिन
वोह दिन भी फिर
ज़रूर आएगा
जब हमारे
बीच का फ़ासला
खुद ही कट जायेगा
खुद ही कट जायेगा
आमीन आमीन आमीन
(समाप्त)
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