कविता : उम्र
उम्र केवल
गिनती नहीं… होती
वोह तो दिखती है
चेहरे की रेखाओं में
झाँकतीं मिचमिचाती बेचैन
बेज़ार आँखों में
कुपोषिषित कमजोर
देंह में
उठने बैठने चलने की
लाचारी में
हर बात में
इज़ाज़त माँगती
मज़बूरी में
असाध्य बीमारी में
खाँसी से कमजोर
छाती में
निशदिन मौत माँगती
भगवान से मरने की
प्रार्थना में
यदि यह सब बातें
उम्र का परिचय देतीं है
तो इसे ही उम्र दराज़
होना भी कहतें हैं
और मजबूरी में जिंदगी
जीना भी इसे ही कहते हैं
(समाप्त)
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