शादी की बात जब चलती है कहीं भी कभी भी तो
तो खुशियों की शहनाइयां बजने लगतीं हैं
कानो में.. सब तरफ उत्साह दीखता है पर जब
यही शादी की बात चलती है दो बुजुर्गों के
बीच यानि कि उम्रदराज लोगों के बीच या
विधवा विधुरों के बीच हर तरफ गुस्सा
हिकारत छी छी थू थू आखिर क्यो ? यदि
एक ऐसा बूढा या विधुर जो सक्षम तो है
आय से भी और शरीर से भी एक बूढी या
विधवा को अपनाना चाहता है जो बेसहारा है
और उसे उसके अपनों ने भाग्य भरोसे तिल
तिल मरने को अभावों और दुखों के साथ
छोड़ दिया है या वैसे भी दो लोग मिलकर
अपना घर फिर से बसाना चाहतें है तो इसमें
बुरा क्या है ?
क्या वे इंसान नहीं क्या उनके सीनो में दिल
नहीं अरमान नहीं याद रखिये बुढ़ापे में साथी
की ज़रुरत सबसे अधिक होती है देखभाल और
भरोसे की ज़रूरल होती है पीठ मलने के लिए
नहाते समय किसी अपने की ज़रुरत होती है
अक्सर ऐसा होता है कि दवा भी होती है रखी
मेज़ पर और गिलास में पानी भी पर ऐसा दौरा
ऐसा पड़ता है की मरीज बिना दवा पानी के इस
दुनिया से बिदा हो जाता है कई बार दौरा पड़ने
पर डाक्टर या मदद बुलाने वाला या अस्पताल
ले जाने वाला आस पास कोई नहीं होता और
मरीज बिना इलाज दम तोड़ देता है कई बार
बूढ़े लोग अकेले रहने पर मज़बूर होते हैं उन्हें
देखने भालने वाला कोई नहीं होता नौकर चाकर
दिन में तो कुछ देखभाल करते हैं पर रात में
यह बुजुर्ग एकाकी पड़ जाते हैं और कई बार
तुरंत मदद न मिल पाने से असमय ही काल
कल्वित हो जाते हैं किसी दिन का अखबार उठा
लीजिये बुजुर्गों के खिलाफ अपराध तेजी से बढ़
रहें है उन्हें लूट लेना उनकी हत्या कर देना कई
बुज़ुर्ग महिलाओं से बलात्कार की घटनाएँ चौकाने
वाली होती हैं और ऐसा इसलिए भी होता है कि वे
लोग अकेले रहने के लिए मज़बूर होते हैं फिरप्रश्न
उठता है ये लोग यदि आपस में शादी करके कुछ
सुविधाये बाँट सकते है एक दूसरे के सहारा बन
बेहतर जीवन जी सकते हैं तो इसमें हर्ज ही क्या है
पुराने ज़माने के संयुक्त परिवारों में इस तरह के
लोग आराम से पल जाते थे और सामुदायिक
जिम्मेदारी से गुज़ारा हो जाता था पर अब छोटे छोटे
परिवार हैं अक्सर पति औरपत्नी दोनों काम पर चले
जाते हैं बच्चों के साथ बुज़ुर्गों की जिम्मेदारी या
विधवा बहिन या भाभी की जिम्मेदारी उनकी
समस्या बढ़ा देती है
लोग आराम से पल जाते थे और सामुदायिक
जिम्मेदारी से गुज़ारा हो जाता था पर अब छोटे छोटे
परिवार हैं अक्सर पति औरपत्नी दोनों काम पर चले
जाते हैं बच्चों के साथ बुज़ुर्गों की जिम्मेदारी या
विधवा बहिन या भाभी की जिम्मेदारी उनकी
समस्या बढ़ा देती है
मेरी समझ में कुछ मुश्किलें ये भी हो सकती हैं :-
पेंशन मिलती है और परिवार उसका लाभ उठता है तो
वोह कभी नहीं चाहेगा कि ऐसी महिला दोबारा शादी करे
क्योकि सरकारी नियमानुसार उसके शादी करते ही
पेंशन की आय बंद हो जाएगी (जो सर्वथा अनुचित
भी है और ऐसी शादियों को बढ़ावा देने के विपरीत है )
दूसरे यदि महिला किसी जायजाद की भी मालकिन है
तो वोह दूसरे के पास चली जाएगी यह कोई नहीं
चाहता तीसरी और बड़ी दिक्कत यह कि दकियानूसी
सोंच के चलते महिला के बच्चे परिवार के लोग
अपमान महसूस करते हैं उन्हें ताने सुनने पड़ते है ,
भारत में ऐसा वातावरण बनने में समय तो लगेगा
पर इस सामाजिक जागरण से शुरुवात तो की ही जा
सकती है हम अपने बुज़ुर्गों पर बड़ा अहसान करेंगे
यदि इसे बढ़ावा देंगे या कम से कम आड़े तो
नहीं आएंगे
विदेशों में समाज की रचना इस प्रकार है कि वहां जब
चाहे शादी की जा सकती है और तलाक लिए जा
सकतें है उम्र या समाज की कोई रोक टोक या रूकावट
नहीं और बुज़ुर्गों की देखरेख सरकार की जिम्मेदारी है
और वहाँ शानदार सर्व सुविधा समपन्न ओल्ड ऐज
होम होते है और लोग शानदार तरीके से रहतें है पर
भारत में ये ही बूढ़े लोग बेसहारा और लाचार हैं और
घर के अनचाहे सदस्य हैं अतः इनके आपसी विवाह
सम्बन्ध इनकी जिंदगी को जीने लायक और आसान
बना सकते हैं और इनके परिवारों को भी जरूर कुछ
राहत मिलेगी अतः अपने घर की विधवाओं विधुरों
बूढ़े बूढ़िओं के ऐसे संबंधों को न केवल सहयोग और
मान्यता दें इन्हे बढ़ावा भी दें याद रहे कल आपको भी
इन्हीं परिस्थियों से दो चार होना पड सकता है
(समाप्त)
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