Wednesday, 22 July 2015

संस्मरण : मैंने खुदा को याद किया


जब  हम नाथूला देखकर लौट रहे थे अचानक  मौसम ख़राब हो गया गहरी धुंध बरसता पानी विजिबिलिटी” निल”  आंडी टेढ़ी   बल खाती ऊँची नीची सड़कें  इधर ऊँचे पहाड़ उधर हज़ारों मीटर गहरी खाईं पिघलती बर्फ बलखाती तेज़ उछल    कूद और भयंकर शोर और रफ़्तार के साथ बहती पहाड़ी नदियाँ दो गाड़ियों में हम  71 साल के बूढ़े से लेकर 5 साल के बच्चे  तक कुल 10 जिंदगियाँसमय शाम के साढ़े चार बजे लगा कि जरा सी चूक और हमारी जिंदगियों की यात्रा यहीं समाप्त अंदर गाड़ी में भयंकर सन्नाटा और अनिश्चित असामयिक मौत का खौफ हर कोई मन ही मन कुशलता और जीवन के लिए दुवा कर रहा था

मैंने भी मन ही मन उस खुदा को याद किया जिसे अनेक नामों से हम जानते है और भगवान शिव गणेशजी राम कृष्ण के नामसे भी पहिचानते हैं उस परमपिता से की गयी मेरी प्रार्थना   सफल हुयी और तमाम बाधाओं के बावजूद हम अपने होटल सकुशल पहुँच गये मुझे और मेरी आस्था को लगता है कि खुदा को पूरे मन से याद करने से ही सकुशल आ पाये उस हस्ती को हमारे हज़ारो सलाम शुक्रिया और नमन

नोट :  मैं अपनी बेटी दामाद उनके परिवार और   उनके एक मित्र डॉक्टर के परिवार के साथ दार्जलिंग और पेल्लिंग होते हुये 13 मई 2015 की शाम सिक्किम की राजधानी गंगटोक पहुंचा और आज सुबह 14 मई को हम सब लोग नाथुला दर्रा जो चीन बार्डर है और बाबा मंदिर चांगलु झील के दर्शन के लिए दो जीप गाड़ियों में गए थे

अखिलेश चंद्र

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