सोंच को झकझोरता
एक दृश्य
एक मकड़जाल का उसमें फँसे पतिंगे का
पतिंगा फड़फड़ाता था
मकड़ी को मज़ा आता था
वोह अपनी
आठों भुजाओँ
और मुख से
वार पर वार
करती थी
पतिंगा फड़फड़ाता था
छटपटाता था
जान बचाने को
मचलता था
पर उसके बचाव का
कोई उपाय न था
वोह बेबस
मरने को मज़बूर था
उसका जीवन जल
सोंका जा चुका था
वोह छटपटाता
आखिरी साँसे
गिन रहा था
मुझे पतिंगे से थी
अपार सहानिभूतिपर कर कुछ
नहीं पाया
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