रस निचोड़ा हुवा
रसगुल्ले सा मैं
अब खाते समय
रबड़ सा खिंचता मैं
उसे बहुत खल रहा था
रस वो पी चुका था
छीछड़ा ही अब बचा था
वो चाहता था कि
बचा के नज़र
थूँक दे मुझे किधर भी
पर डरता था
वो ज़माने से
ज़माने की रस्मों से
अतः चबलाता
जा रहा था
रस निचोड़ा रसगुल्ला
यानी कि मैं
वो चाहता था कि
मैं फिर से
रस में डूबा
रसगुल्ला बनूँ
ताकि वो
फिर से मेरा
रस निचोड़ सके
पर फिर इसके लिये
उसे मुझे
अवसर देना होगा
पुनः रस में
डूबने का
रस में सराबोर
होने का
पर वो
बहुत ही स्वार्थी
और लालची था
जरा देर को भी
मुझे यानी
रसगुल्ले को
छोड़ सकता नहीं था
ऐसा था
वो और मैं का
अनोखा रिश्ता
(समाप्त)
(समाप्त)
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