Friday, 7 November 2014

कविता :हमारा अन्नदाता


आसमान में अपलक निहारता
बादलों की राह जोहता
अपने अनिश्चित भविष्य से परेशान
हमारा अन्नदाता किसान
तरह तरह के कर्जों से लदा
पसीने से लथपथ
फटी बेवैयाँ पाँव वो रहता है गाँव
धरती माँ को पूजता
गायों बैलों की पूजा करता
उनके गोबर से घर लीपता
उपले बना उनसे   खाना पकाता
खुद भूंख सह हमारा उदर भरता
ऐसा है हमारा अन्नदाता
जो है तो भाग्य विधाता
पर स्वयं कुछ भी तो नहीं पाता
न छाँव न ठाँव न सुख न आराम
ऐसे ही अन्न दाता को हमारा
सादर इज्जत के साथ
लाखों सलाम लाखों सलाम
ईश्वर हमारे अन्न दाता को
सलामत रक्खे स्वस्थ और
खुशहाल रखे नज़रे बद
और बदहाली से दूर रक्खे
आमीन आमीन आमीन

(समाप्त)
अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव


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