Tuesday, 4 November 2014

सोंच विचार : आत्मा शरीर और धर्म

देखा जाय        तो    तीनो    एक दुसरे से
बिल्कुल      अलग      अलग चीजे हैं पर
तीनो सदैव     एक साथ     देखी जाती हैं
जहाँ     आत्मा   परमात्मा    का अंश है
 और उसके    जुदा होने    से शरीर  मृत
हो      जाता हैं और  उसका छय प्रारम्भ
हो       जाता  है    वोह     सिर्फ दफ़नाने
जलाने    या    पानी     में बहाने लायक
ही रह जाता    है और धर्म         का अर्थ
है जो धारण    किया    जाये जैसे      कि
कपडे     हम       भिन्न भिन्न    आकार
प्रकार     रूप     सज्जा    और     रंग के
कपडे        पहिनते है      कभी     ये वंश
परंपरा     या     छेत्र   या  जलवायु     के
अनुसार        पहिने     जाते   है     यानी
धर्म    हम       धारण     करते   हैं अपनी
परवारिक या        सामाजिक    प्रष्टभूमि
के अनुसार    अब      इसी   बात       को
हम     राष्ट्रिय     सन्दर्भ    में    देखते  है  
कही   भी     केवल   जन्म लेने से    हम
वहां      के        नागरिक हो     जाते    है
इसे       जन्मजात   राष्ट्रीयता    कहते हैं
जैसे   जर्मनी     में जनम    लेने    वाला
जर्मन     और    आस्ट्रलिया    में  जनम
लेने    वाला    आस्ट्रेलियन   उसी प्रकार
भारत     में जनम लेने   वाला भारतीय
हिंदुस्तानी     या     इंडियन कहलाता है
इसे    हम    बदल       नहीं      सकते ये
स्वाभाविक     तौर  से     हमें मिलता है
कहीं    पर जनम  लेने मात्र सेअब आज
के      सोंच   विचार के       सन्दर्भ     में
देखें तो  हमारा शरीर    हमारी राष्ट्रीयता
 है  और    वोह    भारतीय    हिंदुस्तानी
या  इंडियनहै   चाहे   हम देश  के किसी
भी छेत्र में रहते  हो   कैसी भी  वेश भूषा
पहनते    हो     कोई भी   खान पान का
तरीका     हो पर   हमारी राष्ट्रीयता एक
ही रहती    हैअब   रहा    धर्म    तो वोह
वंश     परंपरा से    आता है   ज्यादातर
लोग उसीका      पालन     करते है वैसे
अपवाद  के रूप    में    ही      राष्ट्रीयता
या  धर्म      बदला  जाता है     आज के
सन्दर्भ  में   हम      यह कहनाचाहते है
कि हम     सब जो    यहाँ जन्मलिये हैं  
 भारतीय     इंडियन  या हिंदुस्तानी है
 भले      ही धर्म   वेशभूषा   खान पान   
अलग     अलग      हो     पर भारतीय
होने     से    हम     सब       भारत माँ
की संतान    है     और    धर्म  फिरका
जाति भाषा प्रान्त     या राजनीति या
बहकावे    में    आकर जो हम आपस
में   लड़ते     और  परस्पर अविश्वास
रखते है   उसकी बहुत बड़ी     कीमत
हम    सदियों    गुलामी   करके चुका
 चुके हैं पर अब   भी     हम चेते नहीं
हम  गलतियों पर  गलतियाँ   करते
जा रहे है   जरा से     बहकावे      या
उकसाने पर एक  दुसरे को    मारने
काटने तैयार हो जाते है न  हम तर्क
बुद्धि का प्रयोग करते    है न  विवेक
 का लड़ाने वालों की छुद्र स्वार्थपूर्ति
के हम     सहज साधन बन जाते है
अतः   आवश्यकता इस बात की है
की हम समझे  कि आत्मा के वास
के कारण  एक ही पिता की संतान
यानी   आपस में भाई  भाई है और
चूँकि    हम     सभी      हिंदुस्तानी
भारतीय       या     इंडियन है  हमें
भाईचारा     आपस में      निभाना
चाहिये और छुद्र कारणों से आपस
में   लड़ना    हमें शोभा   नहीं देता
(समाप्त)
अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

1 comment:

  1. मजहब नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना
    हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा हमारा

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