शांत मन की झील
विचारों
मंद मंद चलती पवन
उठती गिरती लहरे
बनते भंवर
यादों की गिरती कंकरियाँ
मन की गहराई तक
छूती तुम्हारी यादें
प्यार के अनोखे पल
समझ नहीं पाता
सुख की अनुभूति हुयी
या बिछुड़ जाने का गम
वो तुम्हारे अधखुले नयन
होठों का मंद हास
केशों का लहराना
प्यार से आगोश में
लिपटती तुम्हारी देहियाष्टि
लरज़ती फुसफुसाती आवाज़
सब याद है मुझे
तुम्हारे अनेक संदेह डर
मेरा समझाना आश्वासन
सब याद है मुझे
तुम्हारा अचानक बिछुड़ना
मेरी कुछ न कर पाने की
मजबूरियाँ .....................
सब याद हैं
यादें एक दम ताज़ी
किसी गहरे जखम की तरह
और सब कुछ दफ़न है
कही गहरे में छिपे
खजाने की तरह
इस मन की गहरी झील में
जिसे मैं जानता और महसूस
तो करता हूँ
पर चाहूँ तो भी
किसी को दिखा नहीं सकता
आखिर बात
तुम्हारे मान सम्मान की भी है
और मेरे प्यार के मान की भी
अतः निश्चिन्त रहो
तुम्हारा राज भी दफ़न होगा
मेरे वजूद के साथ
और तब तक रहेगा महफूज़
मन की झील में
उसकी गहराइयों में
पूरी हिफाज़त के साथ
ये मेरी मन की गहरी झील
सब राजों को समेटीगी
अपने में मेरी जिन्दगी में भी
और उसके बाद भी
क्योकि मेरे मन की झील
न केवल शांत है
अपितु गहरी भी है
किसी महासागर की मानिंद
(समाप्त)
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