Saturday, 8 November 2014

लघुकथा-गुरु-अस्थाना-साहेब

हमारे    शहर के सिटी   इंटर    कॉलेज में  श्री अस्थाना
साहेब   हमें  गणित औरअंग्रेजी  पढ़ाते थे    व़े बहुत ही
अनुशासन   पसन्द   कर्ताव्यनिष्ट और हरदिलअज़ीज़
थे उन्होंने शादी नहीं की थी और गरीब परप्रतिभाशाली
बच्चों को अपने घर रखकर उन्हें न सिर्फ मुफ्त  पढ़ाते
थे उनका सारा   खर्च भी वहन  करते    थे   कुछ अमीर
बच्चों को    भी वोह टयूशन शुल्क    के  साथ पढ़ाते थे
बहुत सालों सेयह  सिलसिला चल रहा था   अतः उनसे 
कृपा पाये   और उन्हें  श्रधा से पूजने   वालों  की संख्या
शहर और बाहर बहुत बड़ी थीवोह शाम ७ से ८ के बीच 
शहर में घूमने निकलते और कोई भी छात्र उन्हें घूमता
या आवारागर्दी करता दिख जाता उसे वहीँ पकड़ सवाल
जवाब करते  सन्तुष्ट न   होने पर एक  दो बेंत वहीँ जड़ 
देते और फिर पूरी सजा अगले दिन  क्लास में कई कई
छड़ियाँ टूट जातीं पर अस्थाना साहेब रुकने का नाम न
लेते  लगातार   बोलते रहते   बाबूजी  मटरगश्ती करेगें
आवारागर्दी करेंगे फिर करोगेबोलो फिर करोगे बार बार
माफ़ी मंगवा के   ही शांत होते  फिर पूरी कक्षा से पूँछते
आप लोगों ने   क्या सीखा   अब कोई गल्ती नहीं करेगा 
उस ज़माने में अभिवावकगुरु से कोई सवाल नहीं करते 
थे और उनका   पूरा सम्मान   करते थे   अतः     पिटने
के बाद बच्चे घर पर नहीं बताते थे कि वहाँ  और पिटेंगे


इसी बीच एक दिन घर पर अचानक मेहमान आये मेरी
माँ ने मुझे चवन्नी देकरदही लाने बाज़ार जाने को कहा 
हलवाई   की दुकान से  चवन्नी का दही जो उसनेमिटटी
के    कुल्ल्हड़    में   दिया    लेकर जैसे ही पलटा सामने 
अस्थाना साहेब दिख गये डर और घबराहट से मेरे  हाथ
से दही का   कुल्ल्हड़ जमीन पर गिर कर  टूट गया और
दही बिखर गया देखते ही अस्थाना साहेब मेरे पास आये 
और पूरी बात पूँछी जबहमने बताया तो उन्होंने मेरे सिर
पर हाथ फेरा और कहा अरे भाई मैं आवारागर्दी  के लिये
मना  करता  हूँ   घर  के काम   के लिये  थोड़े  ही      वोह
तो करना ही चाहिये उन्होंने   अपने पास   से   मुझे  दही
खरीद कर दिया और घर जाने को कहा


दूसरी घटना जो याद आती है घर के लिये आलू लेने भेजा
गया मैं बाज़ार में आलू  ढेर में से आलू    चुन कर थैली में
भरने में व्यस्त था कि किसी ने मेरे सिर को पीछे से छुवा
मैंने बिना  पीछे देखे  वोह हाथ  अपने   हाथ से झटक कर 
हटा  दिया फिर उस  हाथ ने छुवा मैंने फिर हटा दिया मैंने
सोंचा कोई दोस्त है  जो शरारत कर रहा हैजब तीसरी बार 
वोह हाथ  मेरे सिर पर आया  मैंने मोटी सी   गाली दी और 
गुस्से से  उठ कर पलटा पर  वहाँ अस्थाना साहब मुस्करा
रहे थे डर के मारे मेरा बुरा हाल …  वे हँसे बोले भाई गाली
 देनेसे पाहिले  पलट कर देख लिया करो मेरी जगह तुम्हारे
पिताजी बड़े भाई  या  कोई भी हो सकता था वोह हँसते हुये
चले गये


तीसरी घटना  बहुत बाद की   है  पढाई  के बाद नौकरी की
शुरुवात हो गयी थी जब शहरमें आता उनसे ज़रूर मिलता
तभी मालूम  पड़ा कि  एक दिन  उन्होंने   एक  ऐसे  लड़के
की पिटाई कर दी जो डकैतों के परिवार से था      अगले ही
दिन 10 से 12 लोग उन्हें मारने कॉलेज   पहुँच गये जैसे ही
यह ख़बर शहर में फैली   हजारो की संख्या में   उनके  पूर्व
छात्र  जिसे जो हथियार मिला उसे लेकर वहाँ    पहुँच गये 
और   उन्हें   देखते   ही  हमलावर   भाग  खड़े   हुये   ऐसी 
लोकप्रियता थी हमारे गुरु  अस्थाना साहेब    की आज भी
वे पूरी श्रधा और सम्मान के साथ   अनगिनित   लोगों के 
मन मस्तिष्क में बसते हैं

हजारों हज़ार नमन


(समाप्त )

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