Tuesday, 11 November 2014

बाल कथा : मुंशी की बदला







बादशाह   अकबर    की  फ़ौज में    अच्छे लाल
नाम   का    एक   बहुत   योग्य और बुद्धिमान
मुंशी था    वोह शरीर  से काफी    दुबला पतला
और सुकोमल    था उसका काम  सेना के लोगों
का हुलिए  एक   बही  खाते में    दर्ज करना था
उस   ज़माने में   आई  डी    कार्ड    तो थे नहीं
लोगों    की   पहिचान   और    उनके वेतन का
वितरण    हुलिए के       आधार पर ही होता था
वेतन देने  से   पहिले कोषा अध्यक्ष  व्यक्ति का
मिलान बहीखाते में    दर्ज हुलिया से करता था
यदि हुलिए मिल   गयी तो    ही उस व्यक्ति की
पहिचान  सुनिश्चित    होती थी  और उसे वेतन
मिलता था
शाही   फ़ौज की   उसी इकाई    में  दिलावर खान
 नाम   का    एक    मुग़ल    सरदार    था    जो 
विशाल  कद काठी  का  और    बहुत  शक्तिशाली
था  एक बार   पहिले  वेतन   को    लेकर उसका
मुन्शी  से झगड़ा    हो  गया    गुस्से में दिलावर
खान ने  अच्छे    लाल को पीट  दिया अच्छे लाल
विरोध तो नहीं     कर  पाया    पर उसने दिलावर
खान से बदला लेने  की  धमकी दी  दिलावर खान
ने    सोंचा  ये लाला मुझसे कैसे बदला ले सकता
है    मैं अधिक  बलशाली हूँ मैं जब चाहूँ   उसे पीट
सकता हूँ
अच्छे लाल    ने बही    खाते से दिलावर खान का
पन्ना    फाड़ा    और नया पन्ना लगा कर हुलिया
लिखा    " दिलावर खान उम्र    लगभग ४० साल
बायीं     आँख फूटी चेहरे     पर तलवार   की चोट
का    गहरा बड़ा    निशान     एक पैर से लँगड़ाता
हुआ " और  कोषाध्यक्ष के साथ जो उसका मित्र था
नौकरी छोड़ कर अन्यत्र चला गया
अगले    ही  माह जब दिलावर खान अपना वेतन
लेने   आया तो    नए मुँशी    और कोषाध्यक्ष  ने
उसका हुलिया बही खाते में दर्ज हुलिये से मिलाया
उन्हें     लगा कि  यह व्यक्ति  कोई जासूस है और
उन्होंने   ताली बजाकर    सैनिकोँ को बुलाया और
दिलावर  खान  को पकड़  कारागार में डलवा दिया
अगली  ही सुबह     मामला क़ाज़ी  सामने     पेश
हुवा और   काजी ने  जब    बही में  दर्ज  हुलिये से
दिलावर    खान  का हुलिया मिलाया  जो बिलकुल
ही   नहीं मिलता था  अतः उसे जासूस करार देकर
सजाये मौत की सजा सुना दी जो अगली  ही सुबह
दी जानी थी दिलावर    खान ने   बहुत कोशिश की
कि     क़ाज़ी को     हकीकत  बताये पर क़ाज़ी एक
जासूस से कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था
अब दिलावर खान    कारागार  में बंद अपनी मौत
का     इंतज़ार कर  रहा  था और जार जार रो  रहा
था वोह    अपने को कोस रहा था कि    उसने मुँशी
अच्छे लाल    से क्यों बैर      मोल लिया  जिसके
बदले की   कार्यवाही    ने उसे मौत के इतने करीब
पहुंचा    दिया था  

मौत की   सजा से  पहली रात मुंशी    अच्छे  लाल
पहिले कोषाध्यक्ष के साथ दिलावर खान से मिलने
कारागार पहुँचा और  उसका हाल  पूँछा  बेतरह रोते
दिलावर खान ने मुँशी   से अपने   किये की  माफ़ी
मांगी और अपनी जान बचाने की  फरियाद की अब
उसे कलम  की ताकत    का    एहसास हो गया था

मुंशी   अच्छे    लाल ने     उसे दिलासा दिया और
जाकर     काजी साहब     को पूरा  किस्सा  बताया
और    दिलावर खान    को छोड़ने   की विनती की
क़ाज़ी     उनके   साथ    आये    और नए मुंशी व्
कोषाध्यक्ष को    सब    बात    बताई और फिर से
दिलावर खान  का    हुलिया नए पन्ने      पर दर्ज
करवा     के  उसे     इस    चेतावनी के साथ छोड़ा
कि    आगे से  वोह     किसी   राज   कर्मचारी पर
अपने    बल का    अनुचित   प्रयोग    नहीं करेगा
और   मुंशी जी  से  अपने सामने माफ़ी मंगवाई
इस     प्रकार    अपनी  बुद्धि      के बल पर उसने
दिलावर    खान से बदला     ले लिया और कलम
की तलवार पर श्रेष्टता सिद्ध कर दी

(समाप्त)
शिक्षा  :
बुद्धि बल पशुबल से सदा श्रेष्ट हैयदि  उसका
सही ढंग से प्रयोग किया जाये

अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

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