सुबह की नर्म धूप मेँ
दूर तक बिछी घास की चादर
और उसमें चमकती
ओस की बूँदें
यूँ लगती हैं कि जैसे
तुम्हारे लोनारे चेहरे पर
तुम्हारी सिन्दूरी बिँदिया के
आस पास छलक पड़ी चन्द
स्वेद जल की बूँदे
सुबह की नर्म धूप मेँ
बहती मस्त ढंडी बयार
मुझे देती हैं ये संदेशा
कि तुम्हारे नर्म होठों से
निकले हैं कुछ प्यार भरे शब्द
और शर्मा के तुमने मिरा नाम
लिया कुछ बुदबुदाते हुए
अपने दिलकश अंदाज़ में
सुबह की नर्म धूप में
काँपते हैं पेड़ों की टहनियों पर
पत्ते कुछ इस तरह
कि जैसे तुम्हारे गुलाबी होठों पर
थिरकने लगी हो
कोई प्यर भरी धुन
गुन गुन गुन गुन
भौंरा गीत सुनाने लगा
फूल सिर हिलाने लगे
कि तुमने छेड़ा कोई
तराना प्यार भरा
दिल के दिलरूबा से
निकलती आवाज़
स्वर में प्यार की खनक
तुम्हारी पाज़ेब से भी ज्यादा
सुरीली धुन पर
नाच उठा मन मयूर
सुबह की नर्म धूप पर
जब तुम्हारे कोमल तलुवों ने छुई
धरती की नर्म नर्म घास
वॉ अदब से झुक झुक गयी
और की तुम्हारी अगवानी
प्यार से पूरी अदा के साथ
आखिर तुम ही तो हो मिरी
आखरी मंज़िल
जहाँ तक पहुँचने को
भटकता है मिरा दिल
जहाँ जा जा के मिरी सदा
लौट लौट आती है और
हाल दिले माशूक का बताती है
सुबह की नर्म धूप पर
मिरा सारा प्यार
तुम पर निछावर है
ओ मिरी जाने चमन लख्ते जिगर
दिल में छिपी
मेरी कविता या पोएट्री
तू ही तो प्यार है मिरा
और तू ही आरज़ू भी
तू ही जन्नत है मिरी
और आखिरी मंज़िल भी
आज सुबह की नर्म धूप पर
तुझको बेतरह याद करता हूँ
हाँ ये सच है कि
मैं तेरा अनन्य प्रेमी हूँ
और तुझपे मरता हूँ
(समाप्त)
दूर तक बिछी घास की चादर
और उसमें चमकती
ओस की बूँदें
यूँ लगती हैं कि जैसे
तुम्हारे लोनारे चेहरे पर
तुम्हारी सिन्दूरी बिँदिया के
आस पास छलक पड़ी चन्द
स्वेद जल की बूँदे
सुबह की नर्म धूप मेँ
बहती मस्त ढंडी बयार
मुझे देती हैं ये संदेशा
कि तुम्हारे नर्म होठों से
निकले हैं कुछ प्यार भरे शब्द
और शर्मा के तुमने मिरा नाम
लिया कुछ बुदबुदाते हुए
अपने दिलकश अंदाज़ में
सुबह की नर्म धूप में
काँपते हैं पेड़ों की टहनियों पर
पत्ते कुछ इस तरह
कि जैसे तुम्हारे गुलाबी होठों पर
थिरकने लगी हो
कोई प्यर भरी धुन
गुन गुन गुन गुन
भौंरा गीत सुनाने लगा
फूल सिर हिलाने लगे
कि तुमने छेड़ा कोई
तराना प्यार भरा
दिल के दिलरूबा से
निकलती आवाज़
स्वर में प्यार की खनक
तुम्हारी पाज़ेब से भी ज्यादा
सुरीली धुन पर
नाच उठा मन मयूर
सुबह की नर्म धूप पर
जब तुम्हारे कोमल तलुवों ने छुई
धरती की नर्म नर्म घास
वॉ अदब से झुक झुक गयी
और की तुम्हारी अगवानी
प्यार से पूरी अदा के साथ
आखिर तुम ही तो हो मिरी
आखरी मंज़िल
जहाँ तक पहुँचने को
भटकता है मिरा दिल
जहाँ जा जा के मिरी सदा
लौट लौट आती है और
हाल दिले माशूक का बताती है
सुबह की नर्म धूप पर
मिरा सारा प्यार
तुम पर निछावर है
ओ मिरी जाने चमन लख्ते जिगर
दिल में छिपी
मेरी कविता या पोएट्री
तू ही तो प्यार है मिरा
और तू ही आरज़ू भी
तू ही जन्नत है मिरी
और आखिरी मंज़िल भी
आज सुबह की नर्म धूप पर
तुझको बेतरह याद करता हूँ
हाँ ये सच है कि
मैं तेरा अनन्य प्रेमी हूँ
और तुझपे मरता हूँ
(समाप्त)
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