Thursday, 13 November 2014

एक खत....... टूटे हुए उदास दिल से

मैंने   सोंचा भी   न था   कि तुम एक रोज़
चुपचाप मिरा  साथ   छोड   चले  जाओगे
न    कभी पलट    के     देखोगे मेरे    ओर
तुम कैसे    बने  इतने     निठुर      कठोर
फैला के निराशा का  अँधेरा  मेरे चहुँ ओर
तुमने पकड़ी  नयी राह  नये साथी के संग
मन में  लिये     नयी   आशा   और  उमंग
मुझे भाग्य भरोसे छोड  तुमने लिया   मुँह
मोड़  और    मुझसे ये   करते हो    उम्मीद
कि       मैं   तुम्हारी    नई    जिन्दगी    में
खुशहाली  की  कामना    करूँ  तमाम गिले
शिकवे    छोड़  तुम्हारे   लिये प्रार्थना  करूँ
तुम  ये   भी कहते हो   कि   अब  भी  मुझे
बहुत  प्यार   करते   हो मुझ  पर मरते हो
पर मत भूलो दो नावों का सफ़र ख़तरनाक
होता है अक्सर   ऐसा आदमी  नदी के बीच
गर्त   में होता है  जब दोनों   नावें   विपरीत
दिशाओं   में चल पड़ती हैं  अतः    अभी भी
व़क्त     है  लौट    आओ   मुझे     और      न
आजमाओ   अभी  भी तुम्हारे लाख सितमों
और गुनाहों के  बावजूद  कुछ प्यार  तुम्हारे
हिस्से का बाकी है शायद ये  ही तुम्हारे लिये
आशा  की किरण भी है और आख़िरी उम्मीद
भी    अतः   मुझे   और न    आजमाओ  और
अपनी   गलती सुधार  फ़ौरन मिरे पास लौट
आओ

बाकी खुदा हाफ़िज़  ..........

  हम हैं तुम्हारे
           जिनके तुम बने न सहारे

(समाप्त)

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