Sunday, 9 November 2014

लघु कथा :अच्छे मियाँ

बचपन में     हम अपने    बड़े भैया दिनेश    जी   के
चेले थे     हम दोनों ही    पतंगों के  बहुत शौक़ीन थे
पूरे    पूरे     दिन धूप में छावं    में हम पतंग उड़ाया
करते     दिवालीके     अगले रोज़ पड़ने   वाला दिन
जमघट    कहलाता था   खूब       पतंगें    उडती थी
हमारा      खाना पीना    नाश्ता सब     छत पर   ही
होता  माँ    या     भाभी लोग        आवाज़   लगाती 
लगाती    थक कर    हमारा    खाना    नाश्ता ऊपर
ही ले आती

समय    के साथ शौक बढ़ता     ही गया    बड़े भैया
आगे पढने     दुसरे शहर गये  हम अकेले ही पतंग
उड़ाते  हमारे     मोहल्ले में    भैया के दोस्त अच्छे 
मियाँ    रहते थे वे और     उनके बड़े   भाई आबिद 
भाई    भी पतंग के शौक़ीन     थे जमीदार लोग थे
उनके    घर में पतंग   और मंजा    रखने  के लिये
बड़े      बड़े कमरे थे जो     इनसे भरे रहते थे दोनों 
भाई बहुत खुश  दिल और      दिलदार थे खूब  बड़े
बड़े   पतंग   लम्बे     लम्बे पेंच लड़ाते  पतंग  कट 
गयी    तो डोर वापस   खीचने के   बजाय    अपने
हाथ से डोर तोड़ देते थे

हम अच्छे मियाँ   को बड़ा   भाई     ही मानते और
समझते    थे पर उन्हें मुझे   सताने में बहुत मज़ा
आता    था इधर हमने    पतंग  थोड़ी ऊपर  उड़ाई
कि   न   जाने कहीं आकाश    के   किसी कोने में 
पहिले     से टंगी   उनकी   पतंग सर सर   करती 
आई    और हमारी   पतंग कट   गयी   हम   जोर 
जोर   से चिल्लाते पर  उनका शगल  जारी रहता
पतंग    काट कर खूब   जोर से हँसते  वोह 'काटा 
चिल्लाते  फिर हम उनसे मिन्नत करने लगे पर
वे अपने पर बदस्तूर कायम थे

तंग   आकर    हम डोर  को चौहरिया करते और
फिर   पतंग उड़ाते कभी  कभी    तार भी बांधते 
कि    शायद अब  वे   हमारी पतंग न काट पायें
पर वोह बाज   न आते   और हमारी पतंग जरा
ऊपर गयी कि वोही   सर सर और हमारी पतंग
हत्थे से कट   जाती  हार कर हमने युक्ति सोंची
चौहरिया     लँगड़ तैयार  कर  दोनों  सिरों   पर 
भारी पत्थर बांधे और इन्तजार करता जैसे ही
अच्छे मियाँ की   पतंग के  पेंच लड़ते और डोर
काफी   नीचे हमारी छत पर नीचे आती हमारा
लंगड़ उनकी   डोर के आर पार और दोनों छोर 
पकड़   कर    रेतना चालू   अब   अच्छे मियाँ 
चिल्लाते अरे भैया ऐसा मत करो मान जाओ 
पर   गुस्से और    प्रतिशोध से भरा मैं उनकी
पतंग काट कर ही मानताऔर अब ऐसा रोज
और हमेशा होता  उनका पतंग का शौक मार
खा रहा था


अब वोह समझौते के रस्ते पर आ गये मुझे 
कई पतंगे और चरखी भरके डोर दिया सिर
पर हाथ फेरा और फ़िर न सताने  का वादा
किया  मैं भी  मान गया   मुझे उनमे प्यार
करनेवाला बड़ा भाई ही दिख रहा था


आज    इतने वर्षों   बाद   उनको   याद कर 
अच्छा लग रहा है  वे एक बेहतर इंसान थे


(समाप्त )
  

No comments:

Post a Comment