बुढ़ापा सोंचो तो एक चित्र मन में उभरता है
धँसी धँसी आँखे मोटे कांच के चश्मे पोपले
मुँह झुरियों दार चेहरे उदास थके हारे अपने
अपने घरों में उपेक्षित पुराने सामान की तरह
बेमन से घर में रक्खे या बाहर फेंके हुये बेहाल
इन्होने न केवल जन्म दिया अपितु उनके
पालन पोषण और भविष्य बनाने के लिए
अपना पेट आधा ही भरा सारेअरमानो का गला
पालन पोषण और भविष्य बनाने के लिए
अपना पेट आधा ही भरा सारेअरमानो का गला
घोंट डाला आज उन्ही से उपेक्षित होकर अपने
को ठगा सा महसूस करते हैं
हम सभी ने श्री अभिताभ बच्चन द्वारा
अभिनीत फ़िल्म "बागवान " देखी ही है चार
चार लड़कों का पिता उन्हें कुछ बनाने के लिए
अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया परबाद में
कितना दुःख भी झेला वो तो फ़िल्म सुखान्त
बनगयी क्योकि उनकी किताब "बागवान " न
सिर्फ छप गई हिटभी हो गई पर सब कोई
इतना भाग्यवान भी नहीं होता
अभिनीत फ़िल्म "बागवान " देखी ही है चार
चार लड़कों का पिता उन्हें कुछ बनाने के लिए
अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया परबाद में
कितना दुःख भी झेला वो तो फ़िल्म सुखान्त
बनगयी क्योकि उनकी किताब "बागवान " न
सिर्फ छप गई हिटभी हो गई पर सब कोई
इतना भाग्यवान भी नहीं होता
कभी मथुरा बृन्दावन की गलियों में भीख
माँगती या मंदिरों में गाती बजाती माइयों को
देखो क्या वेआसमान से टपकी या धरती से
उभरी हैं नहीं ये वे ही उपेक्षित माताएँ है जो
घर से बाहर उनुपयोगी सामान की तरह
फेंक दी गयीँ
माँगती या मंदिरों में गाती बजाती माइयों को
देखो क्या वेआसमान से टपकी या धरती से
उभरी हैं नहीं ये वे ही उपेक्षित माताएँ है जो
घर से बाहर उनुपयोगी सामान की तरह
फेंक दी गयीँ
पर क्या ये वृद्ध सचमुच उनुपयोगी थे क्या
उनके अनुभव या शरीर कि बची हुई ताकत
उनके अनुभव या शरीर कि बची हुई ताकत
बनते हैं और आज की मजबूरियों के चलते
जहाँ दोनों पति पत्नी को काम पर जाना होता
है और नौकर रखना महँगा और खतरे का
काम होता है तो बूढ़े माता पिताया सास ससुर
है और नौकर रखना महँगा और खतरे का
काम होता है तो बूढ़े माता पिताया सास ससुर
याद आते हैं कि वे न केवल अपने नाती
नातिन या पोते पोती को भरपूर प्यार देँगे
और उनका ख्याल रखेंगे और उन्हें पारवारिक
सँस्कार भी देंगेआज भी वे परिवारभाग्यशाली
नातिन या पोते पोती को भरपूर प्यार देँगे
और उनका ख्याल रखेंगे और उन्हें पारवारिक
सँस्कार भी देंगेआज भी वे परिवारभाग्यशाली
हैं जहाँ ये बुजुर्ग मौजूद हैं और उन्हें उनकी
सेवा के बदले केवल उचित देखभालऔरआदर
सम्मान की ही दरकार रखतें है
सेवा के बदले केवल उचित देखभालऔरआदर
सम्मान की ही दरकार रखतें है
अतः आवश्यकता इस बात कि है कि हमसभी
समाज के लोग इस बात को समझें और
अपनी अपनी जिम्मेदारियों और आवशकताओं
अपनी अपनी जिम्मेदारियों और आवशकताओं
के साथ मिलजुलकर सुखपूर्वक जियें
ये सभी बुज़ुर्ग न केवल परिवार की अपितु
समाज और देश की बहुमूल्य सम्पत्ति है अतः
इनकी उचित देखभाल भी इन्ही की जिम्मेदारी
है यदि ऐसा हो जाता है तो बुढ़ापा दुखदाई से
सुखदाई बन सकता है केवल सही ढँग से
प्रयास और विचार जागरण कि आवश्यकता है
प्रयास और विचार जागरण कि आवश्यकता है
याद रखें जो आज जवान हैं कल बूढ़े भी होंगे
और उनके बच्चे बड़े धयान से उनका आचरण
अपने माँ बाप की तरफ देख और परख रहें है
जो अंततः उन्ही के ऊपर प्रयोग होगा अतः
भूल से भी बुज़ुर्गों से गलत व्योहार न करें
भूल से भी बुज़ुर्गों से गलत व्योहार न करें
(समाप्त)
बधाई श्रीमानजी, इस सम्बन्ध मे एक अलग दृष्टिकोण veenapati मे पढ़िये ' वृद्ध प्रताड़' link है
ReplyDeletehttp://sharadkumar.hindiblogs.net
खोल कर स्क्रोल कर के पढ़ा जा सकता है