आदमी रोता हुवा ...
भद्दा दिखता है ... .गन्दा दिखता है ...
और वो ही आदमी मुस्कराता .
हँसता ... अच्छा दिखता है .......
जानतें हैं ... .क्यों ......?
क्योंकि भगवान चाहतें हैं ...
कि वोह हँसे .. ..मुस्कराये ...
इस दुनिया में सबको खुश रखे .....
खुशियाँ ..... .मनाये ......
इसके लिये उन्होंने बनाई ....
यह सुन्दर दुनियाँ .....
कलकलाती नदियाँ .......
हरे भरे पहाड़ ...... .मस्त हवाएँ ..
सुन्दर पशु .. ..पक्षी ....
पर आदमी ने क्या किया ...?
नदियाँ गन्दी की ...
हरे भरे पहाड़ उजाड़ ....
हवाओं में ज़हर भर दिया ...और
पशु पक्षियों का अधाधुन्द शिकार . .कर
दिये जंगल के जंगल उजाड़ ...
खड़े कर दिये काँक्रीटों के
जंगल और पहाड़ ......
सब नष्ट कर डाला और
करते ही जा रहें हैं ....
अपने रोने का सामान ....
इक्कठे ही करते जा रहें हैं ...
भगवान ने आदमी के लिये ...
बनाई ... औरत .....
उसे आदमी बनाये रखने के लिये ..
उसे जन्म देने .. .उन्होंने माँ बनाई ..
उसके साथ खेलने बहिन बनाई ..
प्यारा जीवन जीने पत्नी बनाई
पुत्रियों के रूप में देवियों का प्यार दिया ..
और आदमी ने नारी के हर रूप की ...
बेईज्जती की ... उसे कोख में ही ...
मार डाला .. मूर्खता की हद कर दी ...
जब वह नारी के प्रति असंवेदनशील बना
वह रक्षाबंधन भूल गया …………
शादी के ..पवित्र बन्धन भूल ......गया .
वह पुत्रियों का ...खिलखिलाना भूल गया
वह भूल गया कि ....नारी . .शक्ति है
लक्ष्मी . .दुर्गा ..पार्वती ..के रूप में भक्ति है
वोह हर तरह से .......... .
पूजनीय . ..है सम्माननीय ...है
वोह ....साथिन है आदमी की हर रूप में
वोह .....अर्धांगिनी है आदमी की हर रूप में
खुशियों की चाँदनी या ग़मों की धूप में
पर आदमी ने उसे नष्ट करने की ठान ली
सेक्स रेशियो ... .घटने लगे
लड़के .. ..कुवारे .. .. रहने .... लगे
अब ..जब ..समाज में यह असन्तुलन होगा
तो परिणाम भी समाज को ही भुगतना होगा
ये बढ़ते अपराध नारी के प्रति .....
ये रेप ... हत्याएँ .. ..ये सब क्या हैं ......?
कि नर ...नारी का सहज रेशियो डगमगा गया है
आदमी ...अपने ही भाग्य को खा गया है
और अब वोह कुंठित है रोता है
पर ......अपने किये पर लज्जित नहीं होता है
वोह किये जा रहा है मूर्खता पर मूर्खता
भगवान भी आखिर उसे कहाँ तक सम्भालता
भगवान का बनाया आदमी ..अब रो रहा है
बस रो रहा है ..वोह हँसना भूल गया है
वोह मुस्कराना भूल गया है
और यह हमारा हरा भरा सुन्दर सन्सार
नरक बन गया है ..बद से बदतर बनता जा रहा है
बद से बदतर बनता जा रहा है ....
न जाने आदमी ..........कब चेतेगा ...?
अपनी .... गल्तियों को समझेगा
और उन्हें ....आगे ... .होने से .........रोकेगा ...
फ़िलहाल भगवान भी बेचारे और लाचार हैं
आदमी को समझाने में
उसकी अक्ल ठिकाने लगाने में
उनके प्रयास बेकार हैं ...
उनकी बात न सुनने के हठ पर ............
आदमी बेवकूफी की हद तक जाने को तैय्यार है
(समाप्त)
कहतें हैं आदमी भगवान की उत्कृष्ट रचना है
उसे भगवान ने बुद्धि रुपी निधि दी है पर वह
उसका सदूपयोग न करके विनाश की और कदम बढ़ा
रहा है और भगवान की आवाज़ जो उसके ही अंतस
में ही है नहीं सुनता
उसे भगवान ने बुद्धि रुपी निधि दी है पर वह
उसका सदूपयोग न करके विनाश की और कदम बढ़ा
रहा है और भगवान की आवाज़ जो उसके ही अंतस
में ही है नहीं सुनता
Bahut khoob sahi kaha Aapn3
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