Wednesday, 22 July 2015

सोंच विचार : शादी बड़ी उम्र की


शादी  की बात जब चलती है कहीं भी कभी भी तो
तो खुशियों   की शहनाइयां      बजने     लगतीं   हैं
कानो   में.. सब   तरफ  उत्साह  दीखता है  पर जब
यही  शादी   की   बात   चलती    है   दो    बुजुर्गों    के
बीच   यानि   कि  उम्रदराज    लोगों     के    बीच या
विधवा      विधुरों     के      बीच        हर      तरफ  गुस्सा
हिकारत      छी    छी   थू      थू   आखिर क्यो    ? यदि
एक   ऐसा     बूढा या    विधुर     जो   सक्षम   तो      है
आय     से    भी   और शरीर    से      भी   एक बूढी  या
विधवा को    अपनाना   चाहता है जो        बेसहारा    है
और     उसे   उसके   अपनों ने   भाग्य    भरोसे  तिल
तिल      मरने  को     अभावों  और      दुखों    के साथ
छोड़ दिया  है या    वैसे     भी    दो     लोग     मिलकर
अपना    घर    फिर से   बसाना  चाहतें है     तो इसमें
बुरा  क्या है ?


क्या    वे   इंसान   नहीं क्या    उनके    सीनो   में दिल
नहीं    अरमान     नहीं    याद  रखिये बुढ़ापे  में  साथी
की ज़रुरत    सबसे अधिक होती     है    देखभाल और
भरोसे     की    ज़रूरल    होती है पीठ मलने  के   लिए
नहाते     समय    किसी अपने    की  ज़रुरत  होती   है
अक्सर    ऐसा होता     है कि दवा  भी    होती है    रखी
मेज़     पर और    गिलास में पानी   भी पर ऐसा दौरा
ऐसा पड़ता    है की    मरीज    बिना दवा पानी  के इस
दुनिया    से बिदा    हो जाता है   कई     बार दौरा पड़ने
पर    डाक्टर या     मदद  बुलाने   वाला या अस्पताल
ले    जाने     वाला    आस पास    कोई नहीं होता और
मरीज    बिना    इलाज  दम  तोड़     देता है कई   बार
बूढ़े  लोग अकेले रहने पर    मज़बूर    होते    हैं   उन्हें
देखने    भालने वाला   कोई नहीं होता    नौकर चाकर
दिन    में    तो   कुछ    देखभाल  करते हैं पर  रात  में
यह  बुजुर्ग   एकाकी     पड़     जाते हैं   और    कई बार
तुरंत मदद    न मिल  पाने     से  असमय    ही  काल
कल्वित हो  जाते हैं किसी      दिन का    अखबार उठा
लीजिये     बुजुर्गों के    खिलाफ अपराध   तेजी से बढ़
रहें है उन्हें लूट लेना  उनकी    हत्या कर      देना  कई
बुज़ुर्ग महिलाओं से  बलात्कार की   घटनाएँ चौकाने
वाली होती हैं और ऐसा इसलिए   भी होता है   कि  वे
लोग अकेले रहने   के    लिए मज़बूर होते हैं फिरप्रश्न
उठता है ये लोग यदि आपस में  शादी   करके     कुछ
सुविधाये बाँट सकते है एक   दूसरे    के सहारा    बन
बेहतर जीवन जी सकते हैं तो  इसमें   हर्ज ही क्या है

पुराने ज़माने के संयुक्त परिवारों में      इस  तरह  के
लोग  आराम से  पल   जाते थे    और    सामुदायिक
जिम्मेदारी से गुज़ारा हो जाता था पर अब   छोटे छोटे
परिवार हैं अक्सर पति औरपत्नी  दोनों काम पर चले
जाते हैं  बच्चों के साथ बुज़ुर्गों   की   जिम्मेदारी   या
विधवा  बहिन या  भाभी की      जिम्मेदारी    उनकी
समस्या बढ़ा देती है

मेरी समझ में कुछ मुश्किलें ये भी  हो सकती हैं :-
यदि महिला को उसके पति की मृत्यु के बाद   फैमिली
पेंशन मिलती है और परिवार उसका लाभ उठता  है तो
वोह कभी नहीं चाहेगा कि ऐसी महिला दोबारा शादी करे
क्योकि सरकारी नियमानुसार  उसके  शादी    करते ही
पेंशन की आय बंद   हो जाएगी (जो    सर्वथा  अनुचित
भी  है और ऐसी शादियों को  बढ़ावा देने के विपरीत है )
दूसरे यदि महिला किसी जायजाद  की भी मालकिन है
तो वोह दूसरे  के पास चली जाएगी    यह   कोई   नहीं
चाहता तीसरी  और बड़ी दिक्कत यह कि  दकियानूसी
सोंच के चलते महिला   के बच्चे  परिवार   के    लोग
अपमान महसूस करते हैं उन्हें ताने   सुनने  पड़ते है ,
भारत में ऐसा वातावरण बनने में समय   तो  लगेगा
पर इस सामाजिक जागरण से शुरुवात तो की   ही  जा
सकती है हम अपने    बुज़ुर्गों पर   बड़ा अहसान करेंगे
यदि इसे   बढ़ावा देंगे या    कम    से कम   आड़े  तो
नहीं आएंगे

विदेशों में समाज की रचना  इस प्रकार है कि वहां  जब
चाहे शादी की जा  सकती   है  और   तलाक   लिए जा
सकतें है उम्र या समाज की कोई रोक टोक  या रूकावट
नहीं और बुज़ुर्गों की देखरेख सरकार की  जिम्मेदारी  है
और वहाँ शानदार सर्व सुविधा समपन्न    ओल्ड  ऐज
होम  होते है और लोग  शानदार तरीके से रहतें  है पर
भारत में ये ही बूढ़े लोग   बेसहारा और  लाचार हैं और
घर के अनचाहे सदस्य हैं अतः   इनके आपसी  विवाह
सम्बन्ध इनकी जिंदगी को जीने लायक और    आसान
बना सकते हैं और इनके परिवारों को भी  जरूर   कुछ
राहत  मिलेगी अतः अपने घर की    विधवाओं विधुरों
बूढ़े बूढ़िओं के ऐसे संबंधों को   न केवल सहयोग और
मान्यता दें इन्हे बढ़ावा भी दें याद रहे कल आपको भी
इन्हीं परिस्थियों से दो चार होना पड सकता है



(समाप्त)

कविता : बहुत बुरा होता है जब ....

बहुत   बुरा  होता    है जब
बुढ़ापे   में जीवनसाथी  का
साथ     छूट     जाता    है
और जीवन पुरानी नाव सा
वोह    भी    पतवार  बिन
हो          जाता           है
जीवन    के   भवसागर में
तूफानों         से      घिरी
एकाकी   कमजोर      नाँव
पतवार   या    मांझी  बिन
बुरी     तरह         हिलती
झकझोरे              सहती
अब डूबी       कि तब डूबी
कहीं कोई   साहिल     भी
तो  नज़र    नहीं  आता है
वैसे     तो     संसार     है
तमाम  दुनिया            है
दुनिया   के लोग    भी  है
भरा     पूरा    संसार    है
और    हर   कोई   अपना
ही     नज़र    आता     है
पर      कभी     रात    के
भयानक      सन्नाटे   में
किसी    भयानक   सपने
या       बीमारी         से
अचानक जब  दो     चार
हो           जाता        है
सच       कहता         हूँ
खोया  जीवन साथी   तब
बहुत बहुत  याद आता है
बहुत   बुरा  होता है  जब
बुढ़ापे  में    जीवन साथी
बिछुड़     जाता         है
ये    भी      सच       है
कि    जीवन में      जब
साथ        मिला      तो
बिछड़ेंगे                भी
कभी         न      कभी
बुरा उसे बहुत  लगता है
जो  इस भव   सागर में
एकाकी   रह     जाता है
किससे                 कहे
दिल         की       बात
किससे          बतियाये
आधी    आधी        रात
कौन                लगाये
पीठ    पर          साबुन
नहाते                  वक्त
कौन               खिलाये
गरमा    गर्म      रोटियाँ
खाने        के         वक्त
कौन        साथ   निभाए
दुःख में            सुख में
हर जगह      हर  पल में
हर समय   बस   बिछुड़ा
जीवन साथी याद आता है
बड़ा      बुरा     होता    है
जब      बुढ़ापे           में
जीवनसाथी बिछुड़ जाता है
और सारे सारे     संसार में
एक अजब    उदासी   और
अँधेरा    छोड़    जाता    है
इसीलिए  कहता हूँ  दोस्तों
जीवनसाथी की कदर जानो
उसे    अपना         प्यारा
रंगीन      सहारा      मानो
उस जैसा   न   कोई      है
न     हो      सकता      है
अधिकतर    लोगों      को
यह      सच          उसके
जाने       के     बाद    ही
पता      लगता           है
(समाप्त)

बाल कहानी : मौत का सच


नाना जी   सुबह  की     मखमली    धूप    में
अख़बार   का आनंद ले रहे थे   कि    गोलूजी
पापा के साथ बाहर कार से सैर  कर के  आये
और धप से नाना की गोद में कूद पड़ेअचानक
इस हमले से नाना जी चौंक पड़े    और  बोले

अरे भाई गोलू जी जरा ठीक से बैठो अब  तुम
बड़े हो गए हो

नाना जी की बात अभी    पूरी भी  न हुयी कि
गोलू जी ने सवाल दागा ,नाना जी  मौत क्या
होती  है नानाजी बोले भाई ऐसा क्या हुआ कि
आप ऐसा सवाल कर रहें है   गोलू जी    बोले
रस्ते में  एक आदमी को लेकर लोग काँधों  पे
उठा कर जा रहे थे लोग बोल रहे थे कुछ सत्य
है सत्य है  पापा जी से पूंछा   तो  बोले उसकी
मौत हो गयी है अब आप बताइये   मौत क्या
होती है

नाना जी बोले अब आपके पापा कार से  निकल
कर घर में चले गए क्या अब  कार  अपने आप
चल सकती है गोलू जी बोले  बिलकुल नहीं वोह
तो या तो ड्राईवर  अंकल या  पापा जी  चलाएंगे

तभी तो    वो चलेगी , नानाजी बोले  अब सुनो
जैसे बिना ड्राइवर कार  नहीं चल सकती वैसे ही
बिना आत्मा शरीर नहीं चल   सकता   आत्मा
यानि  भगवान   का अंश जैसे   ही आत्मा गयी
शरीर मर जाता है गोलू जी इस स्पष्टी करण  से
संतुष्ट नहीं दिख रहे थे तो नानाजी ने उनसे कहा
अच्छा  बताओ बल्ब या   पंखा    कब   बंद पड़
जाता  है   गोलू   बोले जब बिजली  नहीं  आती
या   हम उसका स्विच बंद कर देते हैं    नानाजी
बोले इसी    प्रकार जब  शरीर    का भगवान से
सम्बन्ध  टूट जाता है या तोड़ दिया जाता है  तो
परमात्मा का अंश निकल जाता है   और   शरीर
मर जाता है   इसे ही “मौत”   कहते है      शरीर

अब    किसी    काम    का   नहीं    रहता  और
मान्यतानुसार उसे जला  दफना या     पानी  में
प्रवाहित कर दिया जाता है जैसे  हम     कार  में
पेट्रोल डालतें है और तभी वोह    चलती है  ठीक
इसी प्रकार शरीर को जिन्दा रहने    और    काम
करने के लिए भोजन  की आवश्यकता  पड़ती है

और जैसे कार ख़राब होने पर उसे   ठीक  कराने
गैराज में ले जाते हैं वैसे शरीर बीमार    होने पर
अस्पताल या डाक्टर के पास ले जाते हैंऔर जब
कार बिलकुल   ख़राब हो    जाती है यानी चलने
लायक नहीं रहती तो उसे मरा  हुआ मान लेते हैं
बात गोलू जी के समझ में आ चुकी थी और वो
खरामा खरामा निकल लिए


(समाप्त)

कविता : उम्र


उम्र                       केवल
गिनती          नहीं…  होती
वोह         तो    दिखती   है
चेहरे    की        रेखाओं  में
सुनने     के    उपकरणों  में
मोटे मोटे         चश्मो     में
झाँकतीं  मिचमिचाती  बेचैन
बेज़ार          आँखों        में
कुपोषिषित           कमजोर
देंह                            में
उठने    बैठने      चलने की
लाचारी                       में
हर        बात               में
इज़ाज़त               माँगती
मज़बूरी                     में
असाध्य       बीमारी     में
खाँसी     से         कमजोर
छाती                        में
निशदिन   मौत     माँगती
भगवान  से        मरने की
प्रार्थना                      में
यदि   यह     सब      बातें
उम्र    का परिचय   देतीं है
तो इसे    ही    उम्र   दराज़
होना     भी       कहतें   हैं
और मजबूरी    में  जिंदगी
जीना भी   इसे ही कहते हैं
(समाप्त)

कविता :शरीर और आत्मा





शरीर      की       कैद       में
आत्मा     बहुत छटपटाती  है
निकलने  का प्रयास  करती है
पर     निकल     नहीं   पाती
शरीर की.………   माया की
पकड़       बहुत       मजबूत
रिश्तों           की        पकड़
मोहब्बत      की      जकड़न
उसे जल्दी निकलने नहीं देती
शरीर       की  कैद         में
आत्मा ..                 ..पर
रह    रह           कर अपनी
उपस्थिति महसूस कराती है
अच्छे     बुरे   की  पहिचान
बुरे काम    करने में झिझक
वो  ही       सिखाती        है
अच्छे       काम    करने का
ज्ञान            देती          है
अपने       कर्तव्य       पूर्ण
करने    की   प्रेरणा   देती है
जीवन          में   ओज  व्
जोश           देती          है
ईश्वर के    आस्तित्व    का
एहसास        कराती      है
आत्मा बताती है  कि  वोह
यहाँ                      किस
प्रयोजन           से आई है

शरीर      की    कैद      में
आत्मा     बेचैन   होती  है
निकलने    छूटने        को
बेताब       रहती          है
एक      बार     छूटने   या
निकलने का मतलब हैमौत
मौत    का    मतलब     है
निर्जीव शरीर आत्मा गायब
और           शरीर      क्या
बस     मिटटी       समझो
जिसे     जलाया  जाता   है
गाड़ा         जाता          है
या पानी में  बहाया जाता है
एक     बेकार   की     चीज
आत्मा  ही     शरीर      का
ईश्वर        से   सम्बन्ध है
आत्मा     ही शरीर       का
जीवन         रस           है
आत्मा          ही       अतः
साफ़ सुथरी    रखनी   होगी
उसे       दाग धब्बों        से
बचाना                    होगा
चादर            तभी    साफ़
सुथरी         रह      पायेगी
और आत्मा को अपने पीहर
परमात्मा के   घर जाने   में
तब     शर्म   नहीं    आएगी
शरीर   की  कैद    में आत्मा
एक कैदी की भाँति मजबूर है
पर      इतनी भी   नहीं   कि
अतीतयी      शरीर        को
सजा          न दे         सके
उसे सजा        जरूर मिलेगी
जरूर मिलेगी   जरूर मिलेगी
शरीर     का     धर्म है     कि
वोह       अपनी   आत्मा को
सम्भाल        कर         रखे
बुराइयों       से    दूर     रखे
सजा   कर       रखे        कि
शरीर बन जाये      एक मंदिर
और  आत्मा  उसका भगवान
कोमल   सुन्दर  और   महान
पूरा भगवान     पूरा  भगवान
(समाप्त)

कविता : हमारे हिन्दू मुस्लमान ईसाई

मंजुश्री  से   चला    टेम्पो
हिन्दू   मुसलमान  ईसाई
सभी                  सवार
कोपरगंज पहुँचते  पहुँचते
जोर जोर   से झूलने लगा
हिलने लगे     झूलने लगे
हिन्दू   मुसलमान  ईसाई
सभी                   सवार
टेम्पो      इधर      झुकता
तो    सभी    इधर  झुकते
टेम्पो      उधर      झुकता
तो     सभी   उधर  झुकते
न     था      कोई      भेद
हिन्दू मुसलमान ईसाई का
ये सड़क  के गड्ढे सभी को
एकसा ही खेल खिला रहे थे
उनमे     भरा   गन्दा पानी
सभी   को मुँह चिढ़ा रहा था
सभी     एक    स्वर      से
नगर          निगम      को
नेताओं    को    कोस रहे थे
और     उनको     भी    जो
मॉल          रोड          पर
शानदार   कारों  में चलते है
उन्हें       भी         जिनके
घरों       में   कोने       भी
सदा      रोशन   रहतें     हैं
हिन्दू              मुसलमान
ईसाई         का          भेद
ईश्वर  भी नहीं   करता     है
जो सबका सृजन  करता  है
सभी          को         दिये
दो    कान         दो   आँख
सुन्दर     सी    नाक   और
एक     सा   रूप     सिंगार
फिर   इंसान कब और कैसे
हिन्दू      मुसलमान     या
ईसाई    बन    जाता      है
मरता    है        मारता   है
एक        दुसरे            को
पागल   दरिंदों     की   तरह
पैने          दाँतो            से
नोंच         खाने           को
आतुर         हो     उठता  है
पर जब        एक          ही
टेम्पो       में  सवार       हो
हिन्दू मुसलमान और ईसाई
एक    सरीखे  झूला  झूलते
कोपरगंज  की सड़क       के
गड्ढो      से    गुज़रते     हैं
बड़े         ही             बेबस
दुखी  और  कातर  दीखतें  है
और      मासूमियत       का
एक अनुपम रूप ही दीखते है
जरा   सोचिएं   कौन ………?.
कौन   बनाता      है       इन्हे
हिन्दू    मुसलमान  या ईसाई
भुला    के          यह    तथ्य
कि वो  पहिले   एक इन्सान है
और    बाद         में    अपनी
धार्मिक मान्यता   के अनुसार
हिन्दू   मुसलमान   या ईसाई
बस     यहीँ   विचार ज़रूरी है
उन्हें  भड़काने वालों        की
पहिचान      ज़रूरी           है
ताकि      उन्हें पकड़ा जा सके
उन्हें      सजा दी    जा   सके
ताकि    बची रहे इन्सानियत
हमारी  गंगाजमनी    तहजीब
बचे     रहें      हमारे      सब
हिन्दू मुसलमान   और ईसाई
बचके   रहें    सब       इंसान
हमारे      हिन्दू          ईसाई
और                  मुसलमान
न बने किसी बहकावे में हैवान
हमारे    प्यारे देश  भारत   के
रहवासी      उसके        प्यारे
उसकी                   सन्तान
काश           ऐसा           हो
काश          ऐसा            हो
काश          ऐसा    ही     हो
आमीन आमीन आमीन
(समाप्त )

कविता :आज का अभिमन्यु



आज           फिर            उसी
चक्रव्यूव                         में
फँसा      हूँ                      मैं
अभिमन्यु                      सा
लड़ता                         हुआ


अष्ट           कौरवों           से

अपने                        सभी
अस्त्र     शास्त्रों   को आजमाते
टूटे    रथ     के  पहिये     को
लेकर      लड़        रहा     हूँ
पर ………..  पर            मैं
अभिमन्यु       की       मौत
नहीं                      मरूँगा
कृष्ण    और  अर्जुन    सदृश
मेरे    तन     और        मन
मेरे           साथ             हैं
और    मैं    अंततः  हराऊँगा
सभी        कौरवों          को
जीतूँगा   समर    मैं   अनेक
इतना         तो          दम
है         ही            मुझमें
क्योकि   शिव    का    धनुष
व्  कृष्ण        का    चक्र भी
मेरे          पास             है
और   है     परशुराम      का
फरसा                        भी
मेरा    अखंड           साहस
मुझे     बल               देगा
लड़ने का          जूझने   का
शत्रु    के           संहार   का
क्योकि राम      व् कृष्ण का
पुत्र                            मैं
शिव                         का
आशीर्वाद                  प्राप्त
भक्त                          मैं
न                        डरूँगा
न                        अपना
शोषण           करने     दूँगा
उसे                     हराऊँगा
अपने     अदम्य    साहस से
इच्छा          शक्ति         से
वोह   कायरों       के  समान
मुझ                          पर
हमला        करने         का
प्रयास                   करेगा
छुप            छुप        कर
डर             डर         कर
पर                         वोह
सफल       नहीं        होगा
मेरा                आत्मबल
विजयी                   होगा
वोह       धराशायी     होगा
मृत्यु    को     प्राप्त   होगा
इसमें     मुझे             है
न     किंचित          संदेह
न               आप     को
होना                  चाहिए
क्योकि   देवता   पुत्र   मैं
जो चाहूँ वो कर  सकता हूँ
जो चाहूँ वो  कर सकता हूँ
(समाप्त)