Friday, 5 August 2016

हायकू श्रृंखला : "इन्सान " - "भगवान"

सुप्रभात मित्रों

   आपका आज  का दिन और आनेवाले सभी  दिन शुभ हो...

आज इंसान और भगवान पर...भगवान ने संसार बनाया ..उसको सब तरह से सजाया... सँवारा..सुन्दर नदियाँ ...पहाड़ ..जलवायु जंगल... बनस्पति ..करोड़ों तरह के जीव जंतु..फिर उन्होंने इंसान बनाया.
.धरती पर ..शारीरिक रूप से कमजोर पर जबरदस्त दिमाग का स्वामी..इंसान ने भगवान की उपासना के लिए उसकी कल्पना की ..धीरे धीरे पूजा की पद्धतियाँ बदलती गयीं और बहुत सारे धर्मों और भगवानों की कल्पना हुयी..ये सब उसी आदि शक्ति ..भगवान की पूजा और उपासना  के हेतु
हुवा ..कालान्तर में ये भक्त और भगवान अपने अपने स्वार्थ में टकराने लगे और संसार अशान्त और दुखी हो गया..खैर ये फिर कभी..आज चंद हायकू इन्हीं  इंसान और भगवान पर...

"इन्सान" - "भगवान"
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1)   भगवान        ने
       संसार    बनाया   औ
       बना       इंसान

2)  इंसान   ने     भी
      रच      डाला   अपना
      ही        भगवान

3)  पूजा        करता
      उस       भगवान   की
      जीता       इंसान

4)  बुद्धि        प्रचंड
      थी  मनुष्य     में   जागा
       उसका    स्वार्थ

5)   बदली      पूजा
       बदली    पद्धति   औ
       अनेकों      धर्म

6)    हुयी     अशांति
        तब         धरती  पर
        लड़ते        धर्म

7)     भगवान       भी
         दुखी औ  इंसान  भी
         कैसा       संसार

(समाप्त)

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मृत्यु
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1)मृत्यु   कुटिल
       चुपचाप है आती
     हरती   प्राण

2) मृत्यु    राहत
         तमाम व्याधियों को
     काम   तमाम

3)  डरना    कैसा
         मृत्यु अवश्यम्भावी
      साक्षात  सत्य

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आज की विशेष प्रस्तुति "वृद्धावस्था "पर जो जीवन की अंतिम पर बहुत  ही कठिन अवस्था है..

वृद्धावस्था
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1) जीवन     संध्या
       दुर्बल    देहयष्टि
    मन         उदास

2)  थे प्यारे    मित्र
        सिधारे    परलोक
     अकेले      हम

3) शक्तियाँ    घटी
        रोग बोझिल तन
     भूला    है  रब

4) करूँ     प्रतीक्षा
       मौत भी तो न आती
     रोज़     बुलाता

5) डूबता    सूर्य
        देखूँ मैं निशदिन
     निराश    मन

6) दुनियाँ  भी है
          दुनियावाले भी हैं
     कौन   है मेरा

7) अब   बुलाओ
        गिरधर  नागर
     लगे   न    मन

(समाप्त)

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आज 28-02-2017
विषयांतर...

चंद हाइकु....रब की राह में
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1) राग   बैराग
    मन में जली आग
    ईश     कृपा की

2) मानो न मानों
     वोह  है ऊपर जो
     चलाता   सब

3) ज्ञानी    अज्ञानी
     सब      उसके दास
     समझो   इसे

4)  फ़र्क न    होता
      राम  बोल रहीम
      वोह  तो    एक

5)   बन्दे    तू  मूर्ख
       तुझमें  जो बसता
       तू     उसे    ढूंढें

6)  तेरी    कहानी
      मालूम है उसको
      रब      कहते

7)  चाहता     तुझे
      जिसने     है बनाया
      क़ायनात  ये

8)  बंदगी   कर
      या    न कर उसको
      नहीं है  फर्क

9)  प्यार   का  नाम
      ख़ुदा  और बन्दगी
       बच्चे     समझ

10) बदअमनी
        मत फैला डर तू
        क़हर ख़ुदा

(समाप्त)

अखिलेश चंद्र श्रीवास्तव

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