कुछ जाली अधजली अस्थियां
बस इतना ही …
पर तुम नहीं देख पाओगे
मेरी अतृप्त इच्छाएं
मेरी दुनिया से अपेक्षाएं
मेरा प्यार - स्नेह
मेरा क्रोध - घृणा व्
अन्य भावनाएं
जिन्हे चिता जला न पायी
जिन्हे आग जला न पायी
वे समस्त आज भी घूमती हैं
वातावरण में ………
अपनी पूरी तीव्रता के साथ
क्या हुआ जो
विनाशी शरीर नष्ट हो गया
अजर अमर आत्मा तो
अविनाशी है … और
वो है बेचैन अपनी समस्त अतृप्त इच्छाओं अपेक्षाओं के साथ
मेरी आत्मा
तृप्त नहीं होगी
ब्राह्मणो को
खिलाने से या दान से
या तीर्थ पुरोहित की
पूजा अर्चना से
या मेरी अस्थियों के
विसर्जन के मात्र गंगा या अन्य पवित्र नदियों में
तीर्थों में होने से
वोह तो तृप्त होगी जब मेरे बच्चे
जिएंगे सुख से
सुकून से
आपस में रहेंगे प्रेम से
मिलजुल के
अतः सब
कर्म कांड छोड़ सुख से रहिये
दुनियाँ में खुशियाँ बिखेरिये
पितृ मोक्ष के लिए
बस इतना ही काफी है
एक मृतक आत्मा के
तरने के लिए
इतना ही काफी है
(समाप्त}
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Monday, 23 March 2015
कविता :क्या ढूंढते हो
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