Thursday, 12 March 2015

कविता : जिस देश में

जिस देश में ……….
कोई जलनीति नहीं है
करोड़ों    टन    पानी
समुद्र में बाह जाता है
कहीं   बाढ़ ………तो
कही सूखा पड़जाता है
अभिशप्त   है  यह देश
जहाँ पानी    के   बहुतायत   रहते
आदमी   पानी को   तरस  जाता है
कहीं कहीं मीलों से ढो   कर लाता है
और  कहीं  बाढ़ में   घर बार सहित
बह  जाता है या डूबकर मर जाता है


(जबकि शर्म से मरना  इस देश के नेतृत्व को  चाहिये )


जिस देश में …………
नारी         की    कोई
नियति    नहीं       है
बिकती है     पिटती है
जिन्दा जलाई जाती है
दहेज़    की   मांग पर ……..
सबकुछ   लुटा  के भी
उसकी हत्या कर दी जाती है
वोह     माँ   बहिन      पत्नी
बेटी      सभी     रूपों     में
समाज    की सेवा करके भी
बोझ      समझी     जाती है
कन्या भ्रूण की हत्या होती है
उसके       जन्म          पर
रुदन        मच    जाता   है
जहाँ     कन्या का पैदा होना
दुर्भाग्य    माना    जाता   है
वोह    कितनी  भी योग्य हो
पढ़ी   लिखी   हो…….   पर
दहेज़    के    बाजार में  वह
मात्र       एक       कन्या है
जिसके       लिये    वर……
चाहे     वोह   जैसा    भी हो
खरीदा       जाता है     और
वोह   जमाई राजा कन्या को
चाहे    जैसे     रखे      सब
स्वीकार    किया     जाता है
जिस    समाज में   नारी ही
नारी     की    दुश्मन      है
सास       नामक       प्राणी
बहू    को जी भर सताता   है
स्पष्ट    है    कि         हमारी
नारी       असुरक्षित         है
कहीं      कहीं     भोली   और
कहीं         अशिक्षित        है
वो रोज मरती है मारी जाती है
बलात्कार      के    शिकार को
पुलिस   प्रेम    प्रकरण     कह
निपटाती                        है
वोह नित्य मृत्यु को   वरण करती है
उसकी इज़्ज़त धूल  में मिल जाती है
 
(जबकि शर्म से  मरना  इस देश के नेतृत्व को चाहिये )
 
जिस देश में …….
कोई भूमि नीति नहीं है
कहीं पसरा है रेगिस्तान
कही   पहाड ……पठार ……
खेती   योग्य भूमि चंद
बड़े लोगों के है कब्जे में
बटाई     पर     चढ़ा के
जो  मलाई     खा रहे है
मेहनतकश मज़दूर चाहे
भूँखा                   रहे
तिकड़मी आलसी  तोंदू
ऐश         कर     रहे हैं
किसान फसल पैदा करता है
बिचवनिया   खा   लेता   है
अढ़तिया      खा   लेता   है
गोदामों     में         भरकर
जमाखोर    ऐश    करता  है
कभी   कभी   तो फसल  की
लागत     भी  नहीं  मिलती
फसल  तो      प्रभुजी लगा दिये
पर अढ़तिया सही दाम नहीं दिये
किसान आठ  आठ आँसू रोता है
अपनी जवान  कमसिन बेटी को
खूसट   बुढ़ऊ को   व्याह देता है
वो      नित्य                जीता
और      नित्य   ही     मरता है
देश    में कोई कृषि नीति नहीं है
उत्पादों       को      बाजार    में
बेचने  की    कोई जतन  नहीं है
तमाम सरकारी खरीद का गल्ला
सड़ता         है       गोदामो  में
तथा   गरीब   भूँख से   मरते हैं
सड़कों    पर …..        गाँवों में
हमारी         कोई        कारगर
वितरण     नीति भी      नहीं है
और गरीबी       नित्य मरती है
 
(जबकि शर्म से मरना देश के नेतृत्व को चाहिये )
 
(समाप्त )

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