लगभग पचास साल के अन्तराल के बाद हम
मिल रहे थे इस बीच जमाना बहुत आगे निकल चुका था अल्हड जवानी के दौर से पके बुढ़ापे तक पचास बहारें आ जा चुकी थी पर याद हम दोनों को था सब कुछ..... काल बेल दबाने पर तुम्हारा पुलकित प्रसन्न शरीर और मन गेट की ओर आते दिखे फिर गेट खोल तुम साइड में खड़ी हो गयीं मेरे नमस्ते के प्रतिउत्तर में तुम अपनी चिर परचित मुस्कान बिखेर आगे आगे चल दीं पीछे पीछे मंत्रमुग्ध सा मै हॉल में पहुँच गया तुम आगे जा रही थीं कि मैंने पीछे से आवाज दी मुड़कर देखते ही मैंने हाथ में पकड़ा मिठाई का डिब्बा तुम्हारी तरफ बढाया तुमने हाथ बढ़ा कर लेते हुये कहा" इसकी क्या जरूरत थी" मैंने कहा अरे भाई बच्चोंवाला घर है इतना तो करना ही होता है तुम अन्दर जाकर ठंडा पानी और बिस्कुट लेकर आई और टेबल पर रखते रखते बुदबुदाई उस ज़माने में लड़कियों की मर्ज़ी कोई नहीं पूंछता था मै क्या कहता …… तुमअपनी सफाई दे रही थी पर क्या गल्ती केवल तुम्हारी ही थी या मेरी भी ....... मैं तो मर्द था मैंने ही कौन मर्दानगी दिखाई थी कि पृथ्वी राज चौहान की तरह अपनी संयोगिता को उड़ा ले जाता और इसमें भी मजे की बात यह कि न मैंने न ही तुमने कभी एक दुसरे से अपने अपने प्यार का इज़हार ही किया था बस मन ही मन में एक दूसरे को बरसों चाहा था और यह बात सब को मेरे और तुम्हारे घरों में मालूम भी थी तभी तोतुम्हारी मम्मी ने मेरी नौकरी लगने के बाद पूंछा था अब तुम्हारा ...... शादी के बारे में क्या ख्याल है अचानक हुये इस सवाल के लिये मैं तैयार नहीं था जाने कैसे मेरे मुँहसे निकला नहीं नहीं अभी नहीं अभी तो मैं थोड़ा सेटल होना चाहता हूँ जिंदगी को एन्जॉय करना चाहता हूँ मुझे क्या पता था यह कहना मेरी जिंदगी को ही बदल कर रख देगा मैं अपनी नौकरी पर दूसरे शहर चला गया करीब दो माह बाद जब लौटा तो अपने शहर के रेल्वे स्टेशन पर ही तुम्हारे पैरेंट्स सेमुलाकात हुयी तुम साथ में थीं तुम्हारी माँ ने बताया कि तुम्हारी शादी एक आर्मी आफिसर से तय हो गयी है और अगले माह 15 तारीख बसन्त पंचमी के दिन संपन्न होगी मेरे लिए ये बड़ा झटका था चौँक कर मैंने तुम्हारी और देखा तुम बिलकुल बेजान सी दिखीं आँखे सूजी सूजी लाल लाल जैसे खूब जी भर कर रोई हों मैंने शादी तय होने पर तुम्हारे पेरेंट्स को बधाई दी वे लोग चल पड़े और उनके साथ लगभग घिसटती मुड़ मुड़ कर देखती तुम बिलकुल ऐसे जैसे हलाल होने वाला बकरा कसाइयों के साथ जाता है मैं न जाने कबतक वहीँ स्टेशन पर आवाक जड़वत खड़ा रहा जैसे शरीर से प्राण ही निकल गये हों मैं बेंच पर बैठ गया आँखों के आगे अँधेरा छा गया आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे मैं अपने आपको और उस छण को कोस रहा था बहुत देर बाद उठा नल पर मुंह धोया और घर के लिए चल पड़ा फिर वोह दिन भी आया जब तुम शादी के लिये सज धज कर तैयार अपने कमरे में बैठी थीं तुम्हे दुल्हन रूप में देखने की तमन्ना लिये मैँ तुम्हारे घर गया सीढ़ियों से ऊपर जाते ही कमरे के बाहर तुम्हारी भाभी मिली और मुझे रोकते हुये बोलीं अब क्यों आये हो चाँद का दिल तोड़कर तुम्हे क्या मिला तुरन्त चले जाओ मैं क्या कहता वहां से भाग आया मेरा अति आत्मविश्वास मुझे ले डूबा मुझे तुम मिलोगी ही इसका मुझे पूरा विश्वास था तुम्हारे अपने प्यार का इज़हार न करने के बावजूद मैं वोह तुम्हारी आँखों में पढ़ सकता था तुम्हारी बाड़ी लैंग्वेज और व्यवहार में साफ़ झलकता था मुझे देखते ही सब कुछ बदल जाता था जैसे तुम्हारे अंदर मुदित प्रसन्न तुम्हे देख जैसे मेरे अंदर भी हज़ारों कमल खिल जाते थे तुम्हारे घरवाले खासकर तुम्हारी माँ जिन्हे मैं भाभी कहता था मुझे बहुत स्नेह करती थी मैं परोक्ष में उन्हें सासू माँ ही कहता था जब तुम मेरी गली से गुज़रती मेरे भांजे भांजियां मामी आ रही है और भतीजे भतीजियाँ चाची आ रही हैं कह कर मुझे बताते और मैं फ़ौरन खिड़की पर तुम्हारी एक झलकदेख पाने को जा खड़ा होता तुम भी खिड़की की तरफ देखते हुए आतीं नज़र मिलते ही शरमाके मुस्कराते हुये नज़र झुका लेतीं मैं खुश .......... हज़ारो घंटियां जैसे मेरे अंदर बजने लगती दिल इतने जोर से धड़कता क़ि जैसे वो बाहर ही निकल पड़ेगा तुम्हारी छोटी बहन भी मुझे जीजा ही मानती थी जब भी मिलती और मैं उसे सालीजी बुलाता वोहबहुत खुश होती थी एक बार जब कई कई दिन तुम नहीं दिखीं तो मैं बेचैन हो उठा रस्ते में सालीजी को रोक कर पूछा आपकी दीदी नहीं दिख रही आजकल कहाँ हैं वोह हँसी बोली दीदी को बुखार है आप घर पर आओ न उसे अच्छा लगेगा और मैं शाम को तुमसे मिला और तुम्हारी तबियत ठीक हो गयी हाँ तो विषयान्तर हो गया मैं कह रहा था तुम्हारी शादी हो गयी मैं तुम्हारे घर जाता रहा पता लगता तुम अपने परिवार में खुश हो कुछ वर्षों की उदासी के बाद परिवार के दबाव में मैंने भी शादी कर ली पत्नी इतनी अच्छी और स्नेही मिली कि धीरे धीरे मैं भी अपनी गृहस्थी में रमता चला गया ऐसे कई साल बीत गये अचानक एक दिन खबर मिली कि तुम्हारे पति किसी दुर्घटना में मारे गये तुम्हारे घर गया तो तुम्हे किसी और ही रूप में पाया दुःखी परेशान तीन छोटे छोटे बच्चे इतनी बड़ी जिंदगी अनिश्चित भविष्य मैं बहुत दुखी हुआ पर क्या दिलासा देता चुपचाप वहाँ से चला आया दिन पर दिन बीतते गए तुम्हारे बच्चे सेटल हो गये और मेरे भी पर मेरे दिल से तुम्हारी छवि न निकली तो न निकली मेरी सासों में तुम्ही बसी रहीं नींद में अक्सर तुम्हारा नाम बड़बड़ाता था एक दिन श्रीमती जी ने पूछ लिया ये चाँद कौन हैं मैंने बिना कुछ छिपाये सबकुछ बता दिया और यह भी कि एक बार भी हमने एक दूसरे से अपने प्यार का इज़हार कभी नहीं किया वोह समझदार थीं बोली लेकिन आपको पूँछना चाहिये क्या पता यह एकतरफा ही प्यार हो उनकी बात मान मैंने तुमसे मिलने की सोंची पर इतने बरसो बाद परिस्थितियाँ इतनी बदल चुकी थीं कि मिलना आसान न था बहुत सारी शंकाए कुशंकाएं थीं कि तुम क्या सोंचोगी तुम्हारे घर के लोग क्या सोचेंगे तुम अब दादी नानी बन चुकी हो घर में बेटा बहू है फिर हिम्मत जुटाई तुम्हारे नए पते और मोबाइल नम्बर मालुम कर फ़ोन लगाया तुमने फ़ोन उठाया मैंने परिचय दिया और मिलने की इच्छा बतायी तुमने सहर्ष मिलना स्वीकार किया और हम आमने सामने थे मुदित प्रसन्न तन और मन से तुम आव भगत में लगी रहीं चाय सामने रख मेरे सामने बैठ मुझे अपलक निहारते बाते करते हुवे मैंने अपनी बच्चियों उनके परिवारों का जिक्र किया और श्रीमतीजी के निधन का भी तुम्हारी आँखों में मेरे लिए दर्द और सहानुभूति साफ़ दिखी फिर मैंने तुम्हारे परिवार के बारे में और तुम्हारे दिवंगत पति के बारे में पूँछा बताते हुए तुम्हारी आँखे उस दर्द को बयाँ कर रही थी और वो ही दर्द अपने अंदर शिद्दत से मैँ महसूस कर रहा था और जब तुमने अपनी बेटी के असमय विधवा होने की बात कही तो सचमुच वातावरण बहुत बोझिल और असहनीय हो गया मै उठ खड़ा हुआ जाने की इज़ाज़त माँगी पर तुमने खाना खाकर जाइये बोलकर मुझे रोक लिया जबतक खाना लगे हम आमने सामने बैठे अतीत में विचरते रहे जो पूँछने आया था न पूँछ पाया कि कहीं तुम्हारी भावनायें हर्ट न हो जाएँ और तुम बुरा न मान जाओ और यह सोंच कर चला आया की फिर कभी सही कुछ दिन बाद फिर मैंने फ़ोन कर मिलने की इच्छा व्यक्त की तुम्हारी इज़ाज़त मिलते ही मिलने पहुँचा बैठते ही मैंने अपनी फैबलेट फ़ोन पर अपनी चन्द छपी रचनाएँ जो एक इ मैगज़ीन में छपी थीं तुम्हे दिखायीं तुमने पढ़कर सराहा तुम्हारे पोते को जो टी वी पर कार्टून देखने में मगन था मैंने घर दिखाने को कहा पर जब वोह जब न उठा तो तुमने मुझे अंदर आने का इशारा किया और अपना घर रूचि पूर्वक दिखाया जिसकी मैंने प्रसंशा की फिर मैंने तुम्हारी फोटोखींचने की इच्छा प्रकट की जिसे तुमने सहर्ष स्वीकार किया औरबाहर लॉन में पोते के साथ फोटो खिंचवाई फिर जब हम वापस अंदर आकर बैठे तुमने चाय और बिस्कुट लाकर दिये और मेरे सामने बैठ गयीँ पता नहीं कैसे मैं बुदबुदाया मैं तो नौकरी में आ गया था क्या तुम थोड़ा इंतज़ार नहीं कर सकती थीं वातावरण बोझिल हो गया तुम बोली कुछ नहीं पर गंभीरता की मूरत बन गयीँ तुम्हारी बेचैनी तुम्हारे चेहरे पर साफ़ दिखती थी अब असहज सवाल तो मैं पूंछ चूका था और अपनी गलती मुझे समझ में आ गयी थी मैंने चलने की इज़ाज़त माँगी तुम बिना कुछ बोले खड़ी हो गयीं और दरवाजेकी ऑर बढ़ गयींपीछे पीछे मैं गेट तक आया तुम गेट खोल कर एक और खड़ी हो गयी बाहर पहुँच मैंने अपना हाथ हिलाकर बिदा ली तो तुमने भी हाथ हिलाकर मुस्कराने का प्रयास किया और पता नहींकैसे आज भी मैँ वोह नहीं कह पाया जो कहने आया था पता नहीं कब कह पाउँगा …पाउँगा भी या नहीं मैं अपनी इस कमजोरी से कब उबरकर अपनी बात कह पाउँगा भगवान ही जानें (क्रमशः )
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Saturday, 14 March 2015
कहानी :चाँद से
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