Friday, 20 March 2015

कविता : रोटी के पीछे चलता ....इन्सान

तुमसे कुछ कहना
व्यर्थ है ……क्योंकि
तुम्हारी आँखों के
सामने रोटी है और
रोटी के उस पर
तुम्हें कुछ नहीं दीखता

दीखता तो तुम्हे इस
पार  भी  नहीं क्योकि
इधर भी तुम्हारे
स्वार्थ ही हैं
मुँह फाड़े      भूंखे पेट
तुम्हारी आशाओं की झीलें
आकांछाओं के पहाड़

और वोह
जिसने तुम्हारी
आँखों के सामने
रोटी लगाईं है
तुम्हें ले जा रहा है
खरामा … खरामा
अपने चुनिंदा रास्तों पर
अपने स्वार्थों की ओर
और तुम दुम हिलाते
रोटी पर अपलक
निगाहें गड़ाये
चल रहे हो उसके
पीछे पीछे पर
वोह रोटी तुम्हे
कभी नहीं देगा
हाँ कभी कभी
एकआध टुकड़ा फेंककर
तुम्हारी रोटी की चाह
और बढ़ायेगा
और अपना
अनुयायी बनायेगा
तुम्हे अपने
रास्तों पर चलाएगा
और तुम चलोगे उसके पीछे
निःशब्द …दुम  हिलाते
मैं कहता हूँ
कि ईश्वर ने तुम्हे
बनाया था बुद्धिमान बलवान
और प्रतिभाशाली  भाग्यवान
पर तुम क्या बन गये ……?
ज़रा सोंचो
क्या रोटी के पीछे
इस प्रकार चलना
दुम हिलाते ….उचित है
भूल गए सब इंसानियत
सारे ………..पाठ
अतः अब भी समय है
कि सोंचो तुम कौन हो …?
किस प्रयोजन से तुम
धरती पर भेजे गये
उस परमपिता की इच्छा का
उसके द्वारा तुम्हें सौंपे कामों का
क्या होगा यदि
तुमने बिता दिया सारा जीवन
रोटी के पीछे चलते चलते
अभी भी तमाम घड़ियाँ बाकी हैं
जिंदगी की      जवानी की
ओज की        जोश की
अतः जियो भगवान  के पुत्र बनकर
करो अच्छे कर्म इस धरती पर
ईश्वर की इच्छा जानो    समझो
उसी की पूर्ती में लगा दो सारा जीवन
इस माया को
जिसे रोटी कहतें हैं
भोगो …पर उतना ही…कि …
जितने से बस चलता रहे शरीर
और शरीर करता रहे
भगवन के सौंपे तमाम काम

अतः छोडो दुम हिलाना
रोटी के पीछे पीछे चलना
जानो रोटी के उस पर भी
एक भरी पुरी दुनिया है
जिसकी तुमसे तमाम
आशाएं हैं .   अपेक्षाएं हैं
उन्हें समझो    पूरा करो
यह जीवन भी संवर जायेगा
और वोह भी और
ईश्वर की इच्छापूरी करने से तुम्हे
मुक्ति की राह  मिल जाएगी

मुक्ति की राह  मिल जाएगी
मुक्त की राह मिल जायगी
(समाप्त)

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