Friday, 7 November 2014

कविता :हमारा अन्नदाता


आसमान में अपलक निहारता
बादलों की राह जोहता
अपने अनिश्चित भविष्य से परेशान
हमारा अन्नदाता किसान
तरह तरह के कर्जों से लदा
पसीने से लथपथ
फटी बेवैयाँ पाँव वो रहता है गाँव
धरती माँ को पूजता
गायों बैलों की पूजा करता
उनके गोबर से घर लीपता
उपले बना उनसे   खाना पकाता
खुद भूंख सह हमारा उदर भरता
ऐसा है हमारा अन्नदाता
जो है तो भाग्य विधाता
पर स्वयं कुछ भी तो नहीं पाता
न छाँव न ठाँव न सुख न आराम
ऐसे ही अन्न दाता को हमारा
सादर इज्जत के साथ
लाखों सलाम लाखों सलाम
ईश्वर हमारे अन्न दाता को
सलामत रक्खे स्वस्थ और
खुशहाल रखे नज़रे बद
और बदहाली से दूर रक्खे
आमीन आमीन आमीन

(समाप्त)
अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव


Thursday, 6 November 2014

कविता : कलम और तलवार

इतिहास गवाह है उन तमाम छड़ों  के .....कि .
जब जब कलम और तलवार में हुआ है  टकराव ....
कलम ने तलवारों  की धारों को किया है ..कुन्द ...                
और छाँटी    है ..............अज्ञानो कि धुँध ......
प्रकाशित किया है ...ज्ञान के प्रकाश से ...समस्त विश्व ...


कलम ने उगायी है दिमागों की फसल ...
कलम ने पैदा की है आजादी के दीवानों की नसल ..
कलम ने एकता के बीज बोये हैं
कलम ने निखारी किसी भी जाति .....या धर्म की विशेष चमक ...
कलम की है   अपनी चमक ...अपनी    दमक .......
कलम के आदेश पर .........
अपराधियों  की   गर्दन उतारती है ...........तलवार ..
और ....कलम से .......होते भी  है  .......करार ....
बदलते हैं ............राजे   और राजपरिवार ....


(अतः )   कलम की ताकत ......असीम है ...
कलम को मगर अब अपनी ताक़त पहिचान नी होगी ...
इस देश से अज्ञान ....बेरोज़गारी .........
गरीबी ..की धुँध ........मिटानी होगी

(क्योकि )जब कलम अपनी करनी पर .......आ जायेगी ..
तलवार ... स्वयं .......उसकी रक्षा में ........आ जायेगी ...
तब न रहेगा         अज्ञान .....न ...........अँधेरा ........
निकलेगा ..............तब एक ...........नया सबेरा ....


तब कोई .......नहीं करेगा तुलना ...कलम और तलवार की ..
दोनों तब ....दिखायेंगी जौहर ....अपनी ...अपनी ....और
अपने ..........आपसी  प्यार  की .............समझ की ...
एक सवारेंगी ......विचार ...बनायेगी .........जनमत ...
दूसरी ...सम्भालेगी ......अपराधियों को ...गुनाहगारों को ....


 ( और ) बनाएँगी इसी ..पावन धरा को .
.जन्नत .जन्नत और .....और सिर्फ़ जन्नत
काश ऐसा सम्भव हो पाता .........
तो इस देश का .......बेडा पार ....हो जाता ...

आइये हम इस    ओर .......सघन प्रयास करें ....
और अपनी पावन धरा के .........प्रति ...
अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करे .........
अपने कर्त्तव्य का   निर्वाह करें ...


(समाप्त ) कलम  और तलवार ऐसी ताकतें हैं जो हमारे प्यारे देश को दशा
और दिशा दे सकती हैं उसका भला कर सकती हैं ,बशर्ते वे सही हाँथों में हो
और उनका सदुपयोग हो

Wednesday, 5 November 2014

कविता : ओ मेरे खुदा

मुझे   तेरी    तलाश       है
तू मेरे दिल   की    आस है              
तू है      कहाँ छुपा     हुआ
मेरी नज़र    की    ओट से
मैं   ढूंढता       फ़िर्रु    तुझे
हर पहर          हर    जगह
नहीं    मिला   कहीं    मुझे
ढूँढा   तुझे       हर   जगह
थकुंगा       पर    न      मैं
ढूनुँगा    तुझे हर     जगह
मिला  मुझे  न     तू  मुझे
न मंदिर में न मस्जिद में
न गुरुद्वारा     न गिरजे में

मिला भी     तू     मुझे खुदा
मिला   तो कुछ    इस तरह
तू       मुस्कराता      मिला
बचपन की   मुस्कराहटों में
खिलते      हुवे       फूलों में
चिड़ियों की चह चहावटो में
मंद        मंद      बयार   में
निष्पाप  दिल के   प्यार में
उगते  सूरज की    लाली में
खेतों   की       हरियाली में
रिमझिम  बरसते पानी में
बहती नदियों की रवानी में
हर       एक पाक   दिल में
बसा       है                   तू
मेरी       जिंदगी         का
आसरा         है            तू
मुझे        तेरी    तलाश है
तू     मेरे दिल की आस है
तू  मेरी  रूह  की प्यास है
मिलेगा    तू    ज़रूर    ही
ये भरोसा और विश्वास है

(समाप्त)

Tuesday, 4 November 2014

सोंच विचार : आत्मा शरीर और धर्म

देखा जाय        तो    तीनो    एक दुसरे से
बिल्कुल      अलग      अलग चीजे हैं पर
तीनो सदैव     एक साथ     देखी जाती हैं
जहाँ     आत्मा   परमात्मा    का अंश है
 और उसके    जुदा होने    से शरीर  मृत
हो      जाता हैं और  उसका छय प्रारम्भ
हो       जाता  है    वोह     सिर्फ दफ़नाने
जलाने    या    पानी     में बहाने लायक
ही रह जाता    है और धर्म         का अर्थ
है जो धारण    किया    जाये जैसे      कि
कपडे     हम       भिन्न भिन्न    आकार
प्रकार     रूप     सज्जा    और     रंग के
कपडे        पहिनते है      कभी     ये वंश
परंपरा     या     छेत्र   या  जलवायु     के
अनुसार        पहिने     जाते   है     यानी
धर्म    हम       धारण     करते   हैं अपनी
परवारिक या        सामाजिक    प्रष्टभूमि
के अनुसार    अब      इसी   बात       को
हम     राष्ट्रिय     सन्दर्भ    में    देखते  है  
कही   भी     केवल   जन्म लेने से    हम
वहां      के        नागरिक हो     जाते    है
इसे       जन्मजात   राष्ट्रीयता    कहते हैं
जैसे   जर्मनी     में जनम    लेने    वाला
जर्मन     और    आस्ट्रलिया    में  जनम
लेने    वाला    आस्ट्रेलियन   उसी प्रकार
भारत     में जनम लेने   वाला भारतीय
हिंदुस्तानी     या     इंडियन कहलाता है
इसे    हम    बदल       नहीं      सकते ये
स्वाभाविक     तौर  से     हमें मिलता है
कहीं    पर जनम  लेने मात्र सेअब आज
के      सोंच   विचार के       सन्दर्भ     में
देखें तो  हमारा शरीर    हमारी राष्ट्रीयता
 है  और    वोह    भारतीय    हिंदुस्तानी
या  इंडियनहै   चाहे   हम देश  के किसी
भी छेत्र में रहते  हो   कैसी भी  वेश भूषा
पहनते    हो     कोई भी   खान पान का
तरीका     हो पर   हमारी राष्ट्रीयता एक
ही रहती    हैअब   रहा    धर्म    तो वोह
वंश     परंपरा से    आता है   ज्यादातर
लोग उसीका      पालन     करते है वैसे
अपवाद  के रूप    में    ही      राष्ट्रीयता
या  धर्म      बदला  जाता है     आज के
सन्दर्भ  में   हम      यह कहनाचाहते है
कि हम     सब जो    यहाँ जन्मलिये हैं  
 भारतीय     इंडियन  या हिंदुस्तानी है
 भले      ही धर्म   वेशभूषा   खान पान   
अलग     अलग      हो     पर भारतीय
होने     से    हम     सब       भारत माँ
की संतान    है     और    धर्म  फिरका
जाति भाषा प्रान्त     या राजनीति या
बहकावे    में    आकर जो हम आपस
में   लड़ते     और  परस्पर अविश्वास
रखते है   उसकी बहुत बड़ी     कीमत
हम    सदियों    गुलामी   करके चुका
 चुके हैं पर अब   भी     हम चेते नहीं
हम  गलतियों पर  गलतियाँ   करते
जा रहे है   जरा से     बहकावे      या
उकसाने पर एक  दुसरे को    मारने
काटने तैयार हो जाते है न  हम तर्क
बुद्धि का प्रयोग करते    है न  विवेक
 का लड़ाने वालों की छुद्र स्वार्थपूर्ति
के हम     सहज साधन बन जाते है
अतः   आवश्यकता इस बात की है
की हम समझे  कि आत्मा के वास
के कारण  एक ही पिता की संतान
यानी   आपस में भाई  भाई है और
चूँकि    हम     सभी      हिंदुस्तानी
भारतीय       या     इंडियन है  हमें
भाईचारा     आपस में      निभाना
चाहिये और छुद्र कारणों से आपस
में   लड़ना    हमें शोभा   नहीं देता
(समाप्त)
अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

Sunday, 19 October 2014

कविता : वो

हाँ     वो     मैँ     ही    तो हूँ
जो         बहता        है    पानी     की     रवानी   बनकर
जो      बहता        है    शीतल        हवा             बनकर
जो     चमकता    है आसमान   मेँ    बिजली      बनकर
जो      कड़ककर  टूटकर     गिरता      है   क़हर बनकर
हाँ     वो    मैँ    ही    तो हूँ
जो     खेतोँ         उगता     है      अन्न              बनकर
जो    पेडों      पर   लटकता है     फूल      फल   बनकर
जो    जड़         बनकर     पेड़ों       को   खड़ा   रखता है
जो   मनुष्यों    के  जीवोँ     के शरीरों         में  रहता  है
जो    सारे     जगत    की     हरियाली      में  बसता   है
जो   संसार     के सारे      कार्यकलापों   को     करता है
जो    संसार     का    भाग्य विधाता       और नियंता है
हाँ    वो     मैँ    ही   तो हूँ
जिसे        तुम                आत्मा           कहते         हो
जो    तुम्हे     जीवित    और      गतिमान     रखता है
जो तुम्हे जीवन देता और जीवन जीना      सिखाता है
जो जीवन में क्या करना और क्या नहीं     सिखाता है
जिसे       तुम       भगवान     ईश्वर     अल्लाह      या
गॉड      के     नाम     से जानते और   पहिचानते   हो
हाँ       वो  मैँ    ही  तो      हूँ    
तुम्हारे                     अंदर                             स्थित
पर     तुम्हारा   अज्ञान    इतना गहरा और    अँधा है
कि     तुम्हे मेरे होने का कुछ एहसास ही    नहीं होता
तुम     मुझे          ही       ढूँढते          फिरते          हो
मन्दिरोँ    मेँ  मस्जिदों  मेँ  गिरजों     में  तीर्थों     मेँ
काबा काशी  मेँ   ढोंगी    बाबाओँ     के     मठों      मेँ
जंगलों        में      पर्वतों        की       कंदराओं     में
तुम        लड़ते             हो                 आपस        मेँ
मेरे           ही         विभिन्न       नामोँ    की  खातिर
अरे         मूर्खों          यह      भी     नहीं        जानते
कि          जो       मंदिर     ढहा    वो      मेरा घर था
जो       मस्जिद      टूटी वोह        भी     मेरा घर था
जिस        इन्सान       का     तूने      खून      किया
वो      कोई     और   नहीँ   मैँ   ही था   केवल मैं था
जिसका        घर     जलाया     वो       मैं   ही     था
जब    तक तुम इस अज्ञान   से बाहर नहीं आओगे
मेरी      कृपा    व     स्नेह   तुम कभी नहीं  पाओगे
कभी     नहीं  पाओगे        कभी        नहीं   पाओगे
(समाप्त )

सपना या हकीकत



अचानक     आँख खुल    गयी मै   गर्मी
और    पसीने    से   बुरी    तरह नहाया
हुवा    था देखा    ए सी और  पंखा दोनों
बदस्तूर    चल रहें     है पर इतनी गर्मी
और    पसीना   क्यों   शायद  कोई बुरा
सपना    देखा     था घडी पर नज़र पड़ी
सुबह   के    3-35 बज      रहे थे   सोंच
प्रारंभ      हुयी क्या     देखा सपने में..?.
मैंने    देखा एक    विशाल स्त्र्री आकृति
हाल  बेहाल      बिखरे बाल   सूखे होंठ
फटे कपडे पर वो   साधारण स्त्र्री    नहीं
लग    रही थी मैं      उसके आगे बंदना
में    झुकने लगा      और उससे अभय
की    प्रार्थना   करने ही     वाला था कि
उसकी    स्पष्ट   किन्तु    धीमी रूवांसी
आवाज   सुनाई पड़ी   अरे    नहीं नहीं
आप   नहीं   झुकें    और   अभय माँगे
मैं    ही   आपके   सम्मान  में झुकती
हूँ    और   आपसे   अभय   माँगती हूँ
मैं    आश्चर्य में   पड़ गया     और हाथ
जोड़कर    बोला  पहिले      आप  मुझे
अपना    परिचय     दें    फिर  अपना
प्रयोजन     बतलाएं मैं    70 साल का
बृद्ध आपकी    क्या सेवा कर   सकता
हूँ    अभय तो    बहुत  दूर की बात है
फिर    मेरी   हैसियत     ही    क्या है
वो     बोलीं  आप मुझे    अच्छी तरह
जानते    हो  मैं     आपकी  धरती माँ
हूँ    मैं चौंका    औरबोला माँ आपका
कोटि कोटि    नमन    परआपकी ये
हालत    किसने बनाई वोह     बोलीं
उसीने    जो मेरा बेटा    होने का दम
भरता है     पर   सारे कष्ट भी वो  ही
देता    है    वोह    पहाड़ियाँ      खोद 
डालता      है    जँगल     उजड़ता है
नदियों    के     पानी       के   बहाव 
को    तोडमोड़   वोह   आखिर उन्हें 
सुखा    और बर्बाद  कर   डालता है
बांध    बनाकर  वोह   पानी   जमा
 करता       है    जो   अक्सर   बाढ़
और        बदहाली      ही   लाता  है 
नदियों     के      सूखने   से  उनकी 
धारा    के     बीच         रास्ते    पर
बस्तियाँ       बना    लेता है     यही 
बस्तियाँ     जब     कभी    नदी  में 
ज्यादा          पानी   आता    है   या 
बाँधों    से    छोड़ा जाता     है    बह
जाती है     और   जान      माल का
भारी     नुकसान   होता है   नदियों
में    रसायन कूड़ा   करकट      डाल 
उसका     पानी     दूषित कर देता है
जमीन      में   रासायनिक      खाद 
डाल    डाल के    उसकी स्वाभाविक
उत्पादन       छमता  खत्मकर    दे 
रहा     है   उसने हवा   को   भी नहीं
बक्शा     रोज   भरपूर   दूषित गैसें
उसमे     मिला   रहा  है  दुःख   इस
बात      का     है    यह सब वो  कर
रहा      जो     अपने   को मेरा  बेटा
कहलाता     है     मुझे   माँ का कष्ट
समझ     आ   गया  था     और  मैं
उसे     कष्ट मुक्त      भी        देखना 
चाहता    था    पर    मैंने     अपनी
शंका          माँ    के   सामने   रखी
माँ     आपके     करोडो        अरबों
पुत्र     पुत्रियाँ     हैं     फिर      मुझ 
अकिंचन      बृद्ध    को        आपने 
किस      प्रयोजन      से      अपनी
सहायता      के      लिये         चुना 
और     आपको        बिश्वास       है
कि   मैं  अवश्य ये   कार्य    करूंगा
माँ    मुस्करायी     और बोली सही
गलत अच्छा बुरा मैं   भी  जानती
हूँ पर इतना जरूर   जानती  हूँ कि
तुम मेरे   सच्चे भक्त और   पुजारी 
हो   इसलिये   अवश्य ही    अपना 
भरपूर प्रयास करोगे   और लेखक
होने से इस विषय    पर  लिखकर 
 जागरूकता   फैलाओगे   मैंने पूरी
श्रद्धा और भक्ति से  दोनों हाथ जोड़े
और शीश धरती पर टिकाया  मैंने
धरती का प्यार भरा   स्पर्श अपने
सर पर महसूस   किया    मैंने सर
उठाके देखा वोह भव्य आकृति जा
चुकी थी और वातावरण में  भीनी
भीनी धरती की सुगंध तैर रही थी
(समाप्त)
अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

शान से

जियो शान से  मरो शान से
कभी न झुको कभी न रुको
आजाद     देश के वासी हो
खुली      हवा में  सांस लो
स्वच्छ            पानी पियो
सुंदर जलवायु का मज़ा लो
घूमो       देश में सब जगह
पहाड़ो पर समुंदर में किनारे
हरेभरे जंगलों में विचरण करो
पर    याद रखो   कोई चीज़
फ़ोकट में     नहीं     मिलती
इसके     लिये   लड़ना होगा
उनसे    जो            देश की
बदहाली        के           लिये
हैं दोषी      फिर       वो चाहे
नेता        हों        ठेकेदार हों
या      मफिया        या सभी
का गठबंधन         या गिरोह
बिना संघर्ष   कुछ नही मिलता
गीता में स्वयं भगवान ने सच्चाई
के लिये लड़ने का मंत्र दिया था
अतः उठो अपने हक के लिये लड़ो
मज़ा लो       उन     संसाधनों का
जो इश्वर ने          तुम्हे उपहार में
दिये थे   अपने आशीर्वाद के साथ
(समाप्त )