Friday, 26 September 2014

गरमा गरम पराठे

कविता का परिचय :-मेरे कानपुर प्रवास के समय मेरे सरकारी निवास के सर्वेंट क्वार्टर में बिट्टी नाम की एक अधेड़ मुस्लिम महिला सर्वेंट के रूप में 
                          सपरिवार रहती थी उनके सुल्ताना नाम की एक युवती कन्या  और शाहिद वाहिद  नाम के दो पुत्र थे ;प्रस्तुत कविता में उन्ही लोंगो के
                           साथ हमारे संबंधों को दर्शाते हुए कुछ सन्देश समाज को देने का प्रयास किया है 


              
                       गरमा  गरम  पराठे 
दिन ब्रहस्पति वार ........
समय रात के आठ बजे…. 
पिछला दरवाज़ा .....
अचानक खटका ...
खट... खट ..खट ...
पर्दा हटाया ..देखा ..
खड़ी थी सुल्ताना ....
लेकर कुछ प्लेट पर ढक कर ...

दरवाजा खोला ...
अन्दर बुलाया ..
उसने हाथ बढाया ...
ये आप के लिये हैं 
अम्मी ने भेजा है 
ऐसा ..बताया ...
अम्मी ..बिट्टी जो ..
हमारी मैड सर्वेंट हैं ..
बुज़ुर्ग हैं ...मुसलमान हैं 
बहुत ही स्नेही ..व सहृदय हैं ..
वो हिन्दू मुसलमान को  तो जानती हैं 
पर परस्पर प्रेम के चलते ...
आपस में कोई भेद नहीं मानती हैं 
साहब को आलू के गरमा गरम पराठे .....
बेहद पसंद हैं ..ये जानती हैं 
खैर ..सुल्ताना की पकड़ाई प्लेट ..
श्रीमतीजी के हाँथ में थी ..
नवरात के दिन .......
मुसलमान के घर का खाना ...
श्रीमतीजी असमंजस में थीं ...
सुल्ताना जा चुकी थी ...
घर पर केवल तीन व्यक्ति ..
मैं ,श्रीमतीजी और हमारे बुज़ुर्ग 
पचासी वर्षीय ससुरजी ..
धरम करम ...वाले ...
श्रीमतीजी ने बताया ..
नवरात है वे तो नहीं खायेंगे ..
अपने और पिताजी के लिए खाना ...
अलग से बनाएँगी ..
मैं मुस्कराया ...
पराठों से कवर हटाया ..
गरमा गरम पराठे ...
आलू भरे .......
अपनी खुशबू बिखेर रहे थे ..
उनमें से आ रही थी 
प्यार की खुशबू ..
आस्था की रंगत थी उन पराठों पर ..
कंहीं शबरी के बेर ....याद आये ..
जिन्हें श्रीराम ने प्यार से खाये ..
पराठा ..तो ठेठ पराठा था ..
ना हिन्दू था ना मुसलमान 
ना उसका कोई अलग धर्म था ..
ना अलग ईमान था ..
बस पराठा था केवल पराठा ..
उसे उठाया ....
तोडा कौर मुहँ तक लाया ...
खुशबू से मेरा तन और मन भर गया 
बिट्टी के स्नेह से मेरा अंतर्मन तक 
रोमांचित हो गया 
न वहां हिन्दू था न मुसलमान 
कामधेनु के दूध सद्रश ...
सुख देने वाला पराठा था ....
मैंने एक कौर खाया ...
खूब मनको भाया ...
मैंने श्रीमतीजी से कहा ...
कि गौर से देखो ये केवल एक पराठा है 
आलू भरा गोल गोल गरमा गरम 
प्यार और आस्था से सराबोर 
वे मेरी बात मानती हैं 
कुछ कुछ समझ उन्हें भी है 
उन्होंने भी हाथ बढाया ..
हम्दोनो ने ही पराठों को स्वाद से खाया 
हम तृप्त हो रहे थे 
पराठों के प्रेम में सराबोर हो रहे थे 
हाँ ..हमने बुज़ुर्ग पिताजी को नही बताया 
उनकी बरसों पुरानी आस्था को नहीं डिगाया 
उनके लिए अलगसे खाना बनाया 
और प्रेमसे उन्हें खिलाया 
यदि इसी प्रकार से ...
पराठों को लेने देने का ...
प्रचलन चल जाये ...तो 
दुनिया की संकुचित मनोवृति ...
कुछ कम हो जाये 
धर्म बड़ी चीज है इसमें कोइ शक नहीं 
पर मानवता और प्रेम से बड़ी ...
नहीं है…. .....
आस्था के सामने धर्मं कुछ भी नहीं है 
आस्था ही धर्म का भी  मूल है 
आस्था को जो न जान पाया 
वोह धर्म को क्या पहिचान पाया 
खैर हमने पराठे बड़े चाव से खाये 
उसके स्वाद और रस से ...
हमने खूब खूब आनंद उठाये 
अगली सुबह हमने बिट्टी को ...
गरमा गरम पराठों के लिए धन्यबाद दिया 
उनके चेहरे के संतोष और आभा में 
जो इस बात से थी 
कि हमने पराठे ख़ुशी और चाव से खाए 
मुझे तो उनके चेहरे पर…. 
काशी मथुरा और काबा भी ...

नज़र आये ....
काश इस शहर में और भी ..
बिट्टी यां होतीं ..
काश इस शहर में लोग 
भेजते पराठे एक दूसरे के घर ..
तो कुछ तो कम होती ...
यह हिन्दू मुसलमान की खाईं ..
जो इस देश के नेता ...
लगातार बढ़ा रहें हैं ....
और हिन्दू मुसलमान को ...
आपस में लड़ा रहें हैं ......
आपस में लड़ा रहें हैं ..
आपस में लड़ा रहें हैं ...



(समाप्त) 

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