Friday, 13 February 2015

कविता : समय चक्र

कविता : समय चक्र          

समय चक्र घूमता है
सुबह दोपहर शाम रात
फिर सुबह दोपहर शाम रात
ऐसा होता है रोज रोज
फिर इसमें उल्लेखनीय क्या है
हाँ है उल्लेखनीय यदि
किसी दुःख या चिंता या परेशानी से
दिन न कटे वे लम्बे हो जाएँ
शामें बोझिल हो जाएँ
रातें करवटें बदलते काटें
चिंता है कि मिटती नहीं
दुःख है कि जाता नहीं
परेशानी है कि हल होती नहीं
समय चक्र रुक सा गया लगता है
कब बढ़ेगा समय चक्र कुछ पता नहीं
इस रात  का कोई सबेरा भी नहीं
कोई  उम्मीद भी नहीं
कोई रास्ता भी नहीं
हे भगवन यह समय चक्र क्यों रुक गया
समय चक्र चलता क्यों नहीं
कब दोबारा सबेरा आएगा
कब समय चक्र चल जायेगा
अच्छा है जो ईश्वर ने हमें
भूलने की नेमत दी है
और हम जल्द भूल के सभी गम
फिर से खुश होते है और
जिंदगी में मशगूल होते हैं
और समय चक्र फिर
चलने लगता है और होते है
सुबह दोपहर शाम और रात
और उनका  अनावरत  चक्र
वो ही समय चक्र
बारम्बार  लगातार ………..

(समाप्त)
अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव
403 ए ,सनफ्लावर ,रहेजा काम्प्लेक्स
पत्रिपुल के निकट
जिला ठाणे , महाराष्ट्र -421301
मोबाईल -०९३२१४९७४१५ .

No comments:

Post a Comment