Monday, 18 July 2016

हायकू श्रृंखला "मन"

सुप्रभात मित्रों..

आपका दिन शुभ और कल्याणकारी हो..

हमारा "मन"जो ....हमारा स्वामी बन कर कभी दुखी करता है तो कभी सुखी.. कभी चंचल होता है तो कभी स्थिर..और वेग इतना कि अभी यहाँ..अभी कहाँ

यह हमारे जीवन को बहुत प्रभावित करता है..आज चंद हायकू इसी "मन" पर..

मन
***

मन      बेचैन
याद     तुम्हारी आयी
आँसू    ढुलके

मन      हर्षित
उनका  है    संदेसा 
मिलेंगे   हम

मन          चंचल
दिल   में   छाई  ख़ुशी
मिला  है   प्यार

मन    है   स्थिर
पूजा       भगवान की
मिले    आशीष

मन        हमारा
बहुत        वेगवान
रहता      भागता

हमें         नचाता
रखता     है   व्यस्त
हमारा     मन

(समाप्त)
अखिलेश चंद्र श्रीवास्तव

Saturday, 12 March 2016

चर्चा नुमा कविता : ज्ञान कर्म और खुशहाली

ज्ञान होगा             तो कर्म होगा
कर्म होगा       तो खुशहाली होगी
खुशहाली होगी     तो मन नाचेगा
मन नाचेगा      तो आदमी गायेगा
आदमी गायेगा    तो सुख बरसेगा
सुख बरसेगा     तो दिमाग चलेगा
दिमाग चलेगा     तो ज्ञान आएगा
ज्ञान होगा            तो ज्ञान बटेगा
ज्ञान बटेगा          तो  ज्ञान बढ़ेगा
ज्ञान की खेती           लहलायेगी
तो ज्ञान कटेगा          ज्ञान बटेगा
ज्ञान बटेगा             तो कर्म होंगें
कर्म होंगे           तो सुख आएगा
सुख आएगा तो खुशहाली लाएगा
याद रखिये             जहाँ ज्ञान है
वहीँ कर्म है                और जहाँ
कर्म है    वहीँ पर  होगी खुशहाली
इसी बात को        अब इलेक्ट्रिसिटी के
सिद्धांतो                   से भी समझते है
चार्ज इक्कठे होंगे      तो वोल्टेज बढ़ेगा
वोल्टेज बढ़ेगा                      तो कर्रेंट
कम वोल्टेज               की ओर दौड़ेगा      
करेंट जब      रेजिस्टेंस से होकर दौड़ेगा
तो काम होगा                     काम होगा
तो ऊर्जा पैदा होगी          तो खेती होगी
खेती होगी          तो फसलें लहलहायेंगी
फसलें लहलहायेंगी तो खुशहाली आएगी
खुशहाली आएगी           तो चार्ज बढ़ेगा
चार्ज बढ़ेगा                 तो करंट दौड़ेगा
करेंट दौड़ेगा                   तो काम होंगे
काम होंगे     तो         खुशहाली छायेगी
महत्वपूर्ण नोट:-
खुशहाली यदि चाहिये तो ज्ञान अर्जित करना ही होगा ज्ञान अर्जित होगा तो कार्य होंगे और कार्य होंगे तो खुशहाली आएगी  ...अब यहाँ ज्ञान का मतलब है    किसी भी काम का   know how और ज्ञान बाटने से मतलब है    training और काम होने से मतलब है काम ......वोह चाहे हम खेत में करें ....या कारखाने में ...काम होगा तो खुशहाली आएगी .खुशहाली आएगी तो दिमाग चलेगा ..दिमाग चलेगा ...तो ज्ञान बढ़ेगा    और बटेगा      अतः ज्ञान ...कर्म और खुशहाली का बहुत नज़दीकी रिश्ता है ..   जिस दिन हम यह समझ लेंगे ज्ञान अर्जित करके पूरे मन से काम करेंगे ...खुशहाली हमारे कदम चूमेंगी
(समाप्त)

Friday, 19 February 2016

कविता :तुम मतलबी



तुम   कहते     हो   कि       मुझे    प्यार    करते  हो
तुम   कहते   हो    कि        मुझ     पर      मरते  हो
पर     मै     अच्छी     तरह      जानती    हूँ        कि
तुम .. न   तो   मरते  हो    न     ही    प्यार करते हो
मैंने तुम्हारी आँखों में    प्यार   नहीं   भूँख     देखी है
मेरी काँचन काया के लिए एक अजीब  प्यास  देखी  है
कि   कैसे    तुम    मुझे   पाओ  और मेरा   भोग करो
ये    सारे  तुम्हारे    जुगाड़ और युक्ति  मैंने   देखी है
और ये  ही    तुम्हारी भूँख     मैंने      मेरी    सहेलियों
मीना… सीमा  और पल्लवी   के   लिए    भी    देखी है
तुम्हे ललचाते   देखा  है मैंने कामवाली बाई  कमला पर
जो अधेड़ उम्र की  होने   पर  भी  आकर्षक    दिखती है
और पडोसी की  बच्ची  तेरह    साल की  कोमल पर भी
मैं कैसे यकीं कर लूं कि तुम केवल मुझसे प्यार करते हो
और      मेरी   काया से  नहीं    मुझ से सच्चा प्यार करते हो
तुम     मेरा सच्चा प्यार पाके   हरजाई   तो नहीं बन जाओगे
एक   भँवरे की   तरह मेरा   रस चूस   उड़   तो  नहीं जाओगे
पर    पर  मैंने     तो   तुमसे   सच्चा   प्यार    ही    किया है
अपना    प्यार भरा   दिल   पहिली बार  सिर्फ तुम को दिया है
बढ़ा      दिया   है    मैंने   अपने   पाँव   प्यार  की    राहों  में
उम्मीद    है   कि    तुम  सम्भालोगे मुझको   अपनी  बाँहों में
अपने       दिल    में    मेरे   प्यार भरे दिल   को आसरा  दोगे
मुझे      नहीं    करोगे   कभी   निराश और    खूब  प्यार  दोगे
तुम्हारा      तो    मुझे   पता    नहीं  पर    कसम भगवान की
मै     तुम्हे    अपने   पूरे     दिलोजान    से    प्यार   करती हूँ
और    अपनी आत्मा   की तमाम गहराइयों से तुमपर मरती हूँ
इसलिए तमाम खतरों और अंदेशों के बाद भी तुम्हे आजमाऊगी
अपने   भरपूर    प्यार के     भरोसे ही केवल तुमको अपनाऊंगी
आगे        जो   भी  होगा  भाग्य    में     मेरे     देखा   जायेगा .
तू     बना    रहे  मेरा  प्यारा सनम  या   हरजाई   देखा जायेगा
मुझे    भरोसा    है  कि  मैं    अपने प्यार   भरे दिल की बदौलत
तुझको     अपना      प्यारा    बालम        ही     बना     डालूंगी
और   तेरी     आँखों   की   भूँख और   प्यास   सब  मिटा डालूंगी
कि   तू   सिर्फ   मेरा   बन के    रहे इधर उधर ताक झांक बंद करे
और    मेरे   ह्रदय  कँवल   में   बस   सारी    दुनिया से तौबा करे
समझे      मेरे    कातिल … मेरे   छलिया … मेरे   बालम रसिया
तू     मतलबी   तो    है  पर   बहुत प्यार लगे है हमें क्या करूँ जी



मैं  हूँ आपकी …..


(समाप्त)

Tuesday, 26 January 2016

कविता हाइकू : बचपन और कागज़ी नाँव




कविता का परिचय
यह कविता हायकू की विधा में है.. इसमें एक लाइन में पाँच  …
दूसरी  लाइन में सात अक्षर ..और इसी प्रकार पाँच और सात..  
अक्षर के क्रम में कविता चलती रहती है  ..
प्रस्तुत कविता बचपन की   यादों पर आधारित  है  जब पानी
बरसने पर हम कागज़ की  नाँव बनाते ..तैराते  और बहुत खुश
होते थे…..
कविता : बचपन और कागज़ी नाँव

तैराते  हम
बना कागजी नाँव
बरसे   मेघ
रिमझिम जोर से                                                                                             
भरती नाली
उफनती वेग से
नावें हमारी
कुछ दूर चलतीं
फिर उलट
पलट कर डूब
जातीं जल में
हम देखें हो खुश
किसकी नाँव
डूबी किसकी तैरी
हार जीत का
फैसला था नाँव पे
जीत हार में
बिताया बचपन
कागजी नाँव
देती  मज़ा जीत का
खुशियों  भरी
या कड़ुई हार का
कोई बात थी
जो अब तक याद
कागज़ी नाँव
डूबती उतराती
तैरती यादें

(समाप्त)


Monday, 25 January 2016

एक हाइकू कविता : सम्बन्ध डिलीट

एक कविता पिरामिड़ी श्रंखला के रूप में : तू हरजाई

परिचय कविता से
पिरामिड़ी कविता …. कविता की यह  एक नयी विधा है.. इसमें पहिली लाइन एक अक्षर …..दूसरी लाइन दो अक्षर
तीसरी लाइन तीन अक्षर  .. इस प्रकार करते करते.. सातवी लाइन में सात अक्षर  के साथ में कविता समाप्त होती है
.. यानि कि सात लाइन का एक पिरामिड….. अब कभी कभी पिरामिड की श्रंखला का भी चलन चल गया है……
जैसे आप इस कविता में देखेंगे

कविता :   तू   हरजाई ..

मैं
हुई
अकेली
बेसहारा
तूने किया जो
किनारा बेदर्दी
तड़पा मेरा मन



पिया
सुनना
मेरी चीख
जो निकली है
मेरे   दुखी  मन
घायल आत्मा से


तू
तो न
था ऐसा
बेरहम
तोड़ा प्यार
मेरा पूरा जहाँ
लूट गया बेदर्दी


मैं
जियूँ
या मरुँ
तुझे क्या
तूने तो लूटा
मेरा तन मन
ओ बेदर्दी बलम


मैं
तुझे
यूँ याद
करती हूँ
और रोती हूँ
जैसे उजड़ा हो
मन का   उपवन


तू
वहाँ
खुश है
सँग उस
सौतन के ही
दिल तोड़ कर
कैसी पीर दी मुझे


मैं
तुझे
न कोस
सकती हूँ
न सराप ही
तू लगे प्यारा
आज भी बलम जी


मैं
क्या
करूँ जो
पाऊँ तुम्हें
दोबारा फिर
ओ मेरे बलम
बोल  न हरजाई


मैं
न तो
मरती
और न ही
जीती हूँ यहाँ
जख्मी जिगर से
जार जार रोती हूँ


मैं हूँ तेरी अभागी….

मित्र  का कमेंट …


ब॒हुत मजेदार है तुम्हारी हरजाई


(समाप्त)

Wednesday, 20 January 2016

कविता :" मैं और तुम "

मैं
तो था
नादान
अनजान
पर तुम तो
सब जानते थे
खतरे  डगर के


किया 
सचेत 
न बताया
और डुबाई
मेरी किश्ती भी
क्यों  बैर निभाई

मैं
डूबा
गम में
अफ़सोस
पर तुझको
शर्म नही आयी
कैसा दोस्त है तू

हाँ
अब
बताओ
क्या   यह
कविता तुम्हें
पसंद भी आई
तो हाँ कहो न भाई

(समाप्त)